‘G2’ का जाल: जॉन बोल्टन के अनुसार भारत को दरकिनार करना एक रणनीतिक आपदा क्यों है
'भारत को दरकिनार करना खतरनाक': ट्रंप के पूर्व सहयोगी ने अमेरिका-चीन 'G2' विश्व व्यवस्था को नकारा
जैसे-जैसे डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका-चीन केंद्रित ढांचे की ओर झुक रहे हैं, उनके पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने चेतावनी दी है कि नई दिल्ली को नजरअंदाज करना हिंद-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता के लिए घातक साबित हो सकता है।
वाशिंगटन के सत्ता के गलियारों में पूर्व राष्ट्रपति की विदेश नीति के दृष्टिकोण की एक दुर्लभ और तीखी आलोचना सुनाई दे रही है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने सार्वजनिक रूप से 'G2' विश्व व्यवस्था के विचार को खारिज कर दिया है—एक ऐसा ढांचा जो अमेरिका और चीन को वैश्विक मामलों के केंद्र में रखता है। बोल्टन के लिए, यह केवल कूटनीति में बदलाव नहीं है; यह भारत को 'खतरनाक तरीके से दरकिनार' करना है, ऐसे समय में जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भू-राजनीतिक दांव पहले से कहीं अधिक ऊंचे हैं।
दृष्टिकोणों का टकराव
बोल्टन का यह बयान मोदी-ट्रंप संबंधों के लिए एक संवेदनशील समय पर आया है। हालांकि दोनों नेताओं ने हाल ही में फ्रांस में G7 शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात की थी, लेकिन बोल्टन इन मुलाकातों के पीछे के ठोस नतीजों को लेकर संशय में हैं। उन्होंने गौर किया कि बैठक में ठोस परिणामों का अभाव था, हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि व्यक्तिगत संबंधों को सुधारने के लिए यह दिखावा जरूरी था। उनकी मुख्य शिकायत वैचारिक है: उनका तर्क है कि नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच बातचीत अक्सर व्यापारिक विवादों और टैरिफ की खींचतान में दब जाती है, जबकि ध्यान चीनी आधिपत्य की अस्तित्वगत चुनौती पर होना चाहिए।
ट्रंप प्रशासन के पूर्व अधिकारी ने '21वीं सदी के सबसे बड़े मुद्दे' पर स्पष्ट बात कही। चाहे वह ताइवान जलडमरूमध्य के तनावपूर्ण बिंदु हों, दक्षिण चीन सागर का विवादित जल क्षेत्र हो, या वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर घर्षण, बोल्टन बीजिंग की विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को प्राथमिक खतरा मानते हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि अमेरिका-चीन द्विपक्षीय व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित करके, वाशिंगटन उस साझेदार को अलग-थलग करने का जोखिम उठा रहा है जो क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।
यह क्यों मायने रखता है: व्यापक परिप्रेक्ष्य
यह आलोचना अमेरिकी विदेश नीति प्रतिष्ठान के भीतर गहरे तनाव को उजागर करती है। दशकों से, 'G2' का नैरेटिव पश्चिम में उन लोगों के लिए एक आरामदायक स्थिति रही है जो महाशक्तियों के प्रबंधन के माध्यम से स्थिरता पसंद करते हैं। हालांकि, मौजूदा परिदृश्य में, इस दृष्टिकोण को तेजी से पुराना माना जा रहा है। भारत अब कोई मामूली खिलाड़ी नहीं है; यह हिंद-प्रशांत रणनीति का एक अनिवार्य स्तंभ है।
यदि अमेरिका नई दिल्ली के साथ अपने संबंधों को केवल व्यापारिक टैरिफ के संकीर्ण नजरिए से देखता है, तो वह एक मजबूत, सुरक्षा-उन्मुख साझेदारी की बड़ी रणनीतिक आवश्यकता को नजरअंदाज कर रहा है। बोल्टन का पीएम मोदी और ट्रंप के बीच चीन पर केंद्रित रणनीतिक संवाद का आह्वान यह बताता है कि भारत-अमेरिका संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए आर्थिक संरक्षणवाद का बोझ छोड़ना होगा। जोखिम स्पष्ट है: यदि वाशिंगटन क्षेत्रीय गठबंधनों की कीमत पर बीजिंग के साथ अपनी प्रतिस्पर्धात्मक गतिशीलता को प्राथमिकता देने पर जोर देता है, तो भारत को 'खतरनाक तरीके से दरकिनार' करने से एक ऐसा शून्य पैदा हो सकता है जिसे भरने के लिए वर्तमान वैश्विक व्यवस्था तैयार नहीं है।
प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।