'फुटबॉल क्लब' थ्योरी: मणिशंकर अय्यर का 28 साल पुराना मज़ाक आज भी बंगाल की राजनीति को कैसे परिभाषित करता है
ओपिनियन: 'फुटबॉल क्लब' - वह मज़ाक जिसने 28 साल पहले ही TMC की समस्या का सटीक निदान कर दिया था

नब्बे के दशक के अंत की एक भूली-बिसरी टिप्पणी, आज तृणमूल कांग्रेस के संकट को किसी भी औपचारिक राजनीतिक विश्लेषण से कहीं बेहतर तरीके से समझने का जरिया बनी हुई है।
1998 के आखिरी महीनों में, मणिशंकर अय्यर ने तृणमूल कांग्रेस में एक संक्षिप्त और दिलचस्प पारी खेली थी। वे वहां ज्यादा दिन नहीं टिके, लेकिन जाते-जाते एक ऐसी टिप्पणी कर गए जो आज भी बेहद सटीक साबित होती है। अपनी विदाई पर, अय्यर ने वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई से कहा था कि उन्हें तब तक एहसास नहीं था कि तृणमूल असल में 'बंगाल का चौथा फुटबॉल क्लब' है, जो मोहन बागान, मोहम्मदन स्पोर्टिंग और ईस्ट बंगाल की मशहूर तिकड़ी के बाद आता है।
यह सिर्फ एक तंज नहीं था, बल्कि एक निदान था। लगभग तीन दशकों से, यह 'फुटबॉल क्लब' संस्कृति ही पार्टी की पहचान का आधार रही है। कांग्रेस या भाजपा के विपरीत, जो पारंपरिक रूप से विचारधारा या संगठनात्मक ढांचे के आधार पर काम करती हैं, तृणमूल का निर्माण कहीं अधिक बुनियादी चीज़ पर हुआ था: एक जज्बात पर। यह असंतुष्टों के लिए एक ललकार, वामपंथ-विरोधी आक्रोश का जरिया और जमीनी स्तर पर विरोध का एक मंच था।
बंगाल का 'ऑपरेटिंग सिस्टम'
सालों तक, यह मॉडल बेहद प्रभावी रहा। ममता बनर्जी ने सिर्फ एक पार्टी का नेतृत्व नहीं किया, बल्कि एक माहौल तैयार किया। उनके कार्यकर्ता राजनीतिक पदाधिकारियों की तरह कम और क्लब के समर्थकों की तरह ज्यादा काम करते थे, जो ठंडी और तर्कसंगत बहस के बजाय टीम के रंगों को प्राथमिकता देते थे। इसी 'फुटबॉल लॉजिक' ने—जहाँ मुख्य लक्ष्य खेल के नियमों की परवाह किए बिना जीतना होता है—TMC को 34 साल के वामपंथी शासन को उखाड़ फेंकने और राज्य के प्रमुख 'ऑपरेटिंग सिस्टम' के रूप में खुद को स्थापित करने में मदद की।
हालांकि, जिस ताकत ने पार्टी को बंगाल की जनता के दिलों में जगह दिलाई, वही अब उसकी संरचनात्मक कमजोरी साबित हो रही है। जैसे-जैसे पार्टी आंतरिक विद्रोह और 'एंटी-भाईपो' (भतीजावाद विरोधी) भावनाओं से जूझ रही है, दरारें चौड़ी होती जा रही हैं। जब कोई संगठन किसी संवैधानिक पार्टी की मजबूत नींव के बजाय फैन क्लब की अस्थिर ऊर्जा पर टिका हो, तो वह इस अहसास के प्रति बेहद संवेदनशील हो जाता है कि खेल अब बदल रहा है।
बड़ी तस्वीर: यह क्यों मायने रखता है
तृणमूल के भीतर चल रही यह उथल-पुथल महज चुनाव के बाद की सुस्ती या कोई सामान्य राजनीतिक झटका नहीं है। कांग्रेस या भाजपा जैसी स्थापित पार्टियों के पास एक 'कैडर मेमोरी' होती है—वैचारिक और संरचनात्मक आदतों का एक भंडार, जो उन्हें हार सहने और खुद को फिर से खड़ा करने में मदद करता है। इसके विपरीत, TMC के पास यह संस्थागत सुरक्षा कवच नहीं है। यह पहचान के संकट से गुजर रही है, जहाँ 'फुटबॉल क्लब' वाला माहौल अब शासन की वास्तविकताओं और आंतरिक सत्ता संघर्षों से टकरा रहा है।
यह बदलाव बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़े परिवर्तन का संकेत है। यदि TMC की 'फुटबॉल क्लब' थ्योरी—वह मणिशंकर अय्यर वाला मज़ाक जिसने 28 साल पहले ही TMC की समस्या को भांप लिया था—अब मतदाताओं या निराश कार्यकर्ताओं के बीच असर नहीं छोड़ रही है, तो पार्टी अस्तित्व के संकट का सामना कर रही है। एक भावनात्मक आंदोलन से पेशेवर राजनीतिक मशीन में बदलना एक कठिन प्रक्रिया है, और TMC के लिए समय तेजी से निकलता दिख रहा है।
अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।