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आदमखोर बाघिन का अंत: लखीमपुर में वन विभाग को मिली बड़ी कामयाबी, खूंखार बाघिन पिंजरे में कैद

लखीमपुर खीरी में दहशत का सबब बनी बाघिन को वन विभाग ने पकड़ा, दो लोगों की ले चुकी थी जान

द्वारा कबीर शर्माप्रकाशित 23 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
आदमखोर बाघिन का अंत: लखीमपुर में वन विभाग ने खूंखार बाघिन को पकड़ा
आदमखोर बाघिन का अंत: लखीमपुर में वन विभाग ने खूंखार बाघिन को पकड़ा

दो लोगों की जान लेने वाले 15 दिनों के खौफ के बाद, चार साल की एक बाघिन को ट्रेंक्विलाइजर (बेहोशी की दवा) देकर दुधवा के मानव-बहुल बफर जोन से सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है।

बीजुआ और मझगैन के निवासियों के लिए, पिछले कुछ हफ्ते लंबी घास की सरसराहट और उसके बाद पसरे सन्नाटे के खौफ में बीते हैं। लखीमपुर में लोगों को जकड़े हुए इस डर का अंत मंगलवार सुबह हुआ, जब वन विभाग के अधिकारियों ने एक बड़े ऑपरेशन के तहत उस बाघिन को सफलतापूर्वक पकड़ लिया, जिसने 14 और 15 जून को दो लोगों पर जानलेवा हमला किया था।

यह मिशन बेहद सटीक था। दुधवा बफर जोन की डिप्टी डायरेक्टर कीर्ति चौधरी के नेतृत्व में और पशु चिकित्सक डॉ. दया शंकर की मदद से, टीम ने रामनगर कलां के पास इस शिकारी बाघिन को ट्रैक किया। ट्रेंक्विलाइजर गन का इस्तेमाल कर उन्होंने चार साल की इस बाघिन को बेहोश कर काबू में कर लिया। उसे अब मझगैन रेंज कार्यालय ले जाया गया है, जहां उसका स्वास्थ्य परीक्षण किया जा रहा है ताकि यह तय किया जा सके कि उसे आगे कहां रखा जाए। जिन गांवों को उसने अनजाने में अपना शिकारगाह बना लिया था, अब वह वहां से दूर है।

मानव-वन्यजीव संघर्ष

यह घटना कोई इकलौती मिसाल नहीं है, बल्कि भारत के संरक्षित वनों और फैलती मानव बस्तियों के बीच कम होती दूरी की एक कड़वी सच्चाई है। जब कोई जंगली जानवर बाहरी इलाकों में भटक आता है, तो यह अक्सर आक्रामकता नहीं, बल्कि उसके क्षेत्र के छिन जाने का संकेत होता है। हालांकि जान का नुकसान दुखद है और इसने कई परिवारों को तोड़ दिया है, लेकिन पर्यावरणविदों का मानना है कि ये जानवर अक्सर खंडित गलियारों और अतिक्रमण वाले आवासों के शिकार होते हैं।

यह क्यों मायने रखता है: नाजुक स्थिति का पैटर्न

बाघिन के पकड़े जाने से तत्काल सुरक्षा तो मिल गई है, लेकिन यह देश भर के वन विभागों के लिए एक बड़ी चुनौती की ओर इशारा करता है। जैसे ही यह खबर WhatsApp और Twitter पर फैली, इसने वन्यजीव प्रबंधन पर एक जरूरी बहस छेड़ दी। ऐसे जानवरों की निगरानी के लिए सिर्फ पकड़े जाने की प्रतिक्रिया काफी नहीं है; इसके लिए दीर्घकालिक योजना की जरूरत है। चाहे हम इसे Facebook पोस्ट के जरिए देखें या LinkedIn थ्रेड के जरिए, ऐसी घटनाओं का बार-बार होना यह बताता है कि हमारी मौजूदा बफर जोन रणनीतियों को अधिक मजबूत और तकनीक-आधारित निगरानी ढांचे की जरूरत है, ताकि किसी भी अनहोनी से पहले ही उन्हें रोका जा सके।

स्थानीय प्रशासन अब इस स्थिति को संभाल रहा है, जहां एक तरफ समुदाय की चिंताएं हैं तो दूसरी तरफ वन्यजीव संरक्षण के कानूनी नियम। हालांकि Eenadu जैसी एजेंसियों या Yahoo न्यूज़ फीड की ऑटोमेटेड रिपोर्ट में आंकड़े तो मिल जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी है। लखीमपुर के लोगों के लिए, जंगल अब सिर्फ एक पड़ोसी नहीं रहा—यह एक ऐसी जगह है जिसके प्रति अब नए सिरे से और सावधानी बरतने की जरूरत है। इस ऑपरेशन में वन विभाग की सफलता एक राहत है, लेकिन जैसा कि विशेषज्ञ अक्सर कहते हैं, असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि इन बाघों को रहने के लिए पर्याप्त जगह मिले, ताकि हमें उनके अस्तित्व और अपनी सुरक्षा के बीच चुनाव न करना पड़े।

द्वारा कबीर शर्मा
फ़ीचर्स लेखक

कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।