अदालतों की दो टूक: जब कानूनी कार्रवाई बन जाए 'प्रक्रिया का दुरुपयोग'
NewsClick और मदर टेरेसा की संस्था से जुड़े मामले
NewsClick और मिशनरीज ऑफ चैरिटी से जुड़े दो महत्वपूर्ण न्यायिक फैसलों ने लंबी कानूनी लड़ाई के बाद राज्य के हस्तक्षेप की सीमाओं को रेखांकित किया है।
दिल्ली हाईकोर्ट और स्थानीय निचली अदालतों के गलियारों में हाल ही में उन दो हाई-प्रोफाइल कानूनी मामलों का पटाक्षेप हुआ है, जिन्होंने वर्षों से देश का ध्यान खींचा था। जांच एजेंसियों को कड़ी फटकार लगाते हुए, दिल्ली हाईकोर्ट ने डिजिटल न्यूज पोर्टल NewsClick के खिलाफ दर्ज एफआईआर और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह पूरी कवायद 'प्रक्रिया का दुरुपयोग' थी। वहीं दूसरी ओर, एक निचली अदालत ने मिशनरीज ऑफ चैरिटी से जुड़े मामले में सभी आरोपियों को बरी कर दिया, जिससे तस्करी के आरोपों के साथ शुरू हुई आठ साल लंबी अग्निपरीक्षा समाप्त हो गई।
ये मामले एक बार-बार दिखने वाले पैटर्न को उजागर करते हैं: वर्षों की जांच, छापेमारी और मीडिया की सुर्खियों के बाद अंततः न्यायपालिका द्वारा सबूतों की कमी या प्रक्रियात्मक खामियों के कारण मामले का ढह जाना। NewsClick के लिए मुसीबतें 2020-2021 में विदेशी फंडिंग और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) नियमों के अनुपालन से जुड़े आरोपों के साथ शुरू हुई थीं। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इन दावों की जांच शुरू की कि पोर्टल ने फंड को गलत तरीके से पेश किया है, जिसके चलते पत्रकारों के घरों और कंपनी के दफ्तरों पर छापेमारी की गई।
अक्टूबर 2023 में दबाव तब और बढ़ गया जब संस्थापक-संपादक प्रबीर पुरकायस्थ को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत गिरफ्तार किया गया। उनकी हिरासत प्रेस की स्वतंत्रता पर बहस का केंद्र बन गई, जब तक कि 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रियात्मक अनियमितताओं का हवाला देते हुए हस्तक्षेप नहीं किया। अब, हाईकोर्ट द्वारा एफआईआर को रद्द करने का फैसला एक अंतिम कानूनी समापन है, जिसमें अदालत ने माना कि लगभग पांच साल की मुकदमेबाजी के बाद भी अभियोजन पक्ष कोई संज्ञेय अपराध साबित करने में विफल रहा।
सबूतों का बोझ
एक दूसरी अदालत में, मिशनरीज ऑफ चैरिटी के मामले में आखिरकार आरोपियों को न्याय मिला। 2018 में शुरू हुआ यह मामला एक नन और दो अन्य लोगों पर केंद्रित था, जिन पर नवजात शिशुओं की अवैध बिक्री में मदद करने का आरोप था। निचली अदालत का बरी करने का फैसला निर्णायक था; न्यायाधीश ने फैसला सुनाया कि अभियोजन पक्ष तस्करी या जबरदस्ती के दावों का समर्थन करने के लिए पर्याप्त सबूत पेश करने में विफल रहा। लगभग एक दशक बाद, अदालत ने पाया कि आरोपों में सबूतों का अभाव था, जिससे उन लोगों को उन आपराधिक आरोपों से मुक्ति मिल गई, जिन्होंने वर्षों से उनके काम पर साया डाल रखा था।
यह क्यों मायने रखता है: व्यापक परिप्रेक्ष्य
ये फैसले इस बात का गंभीर आईना दिखाते हैं कि सरकारी मशीनरी नागरिक समाज और मीडिया के साथ कैसे व्यवहार करती है। जब जांच लगभग एक दशक तक खिंचती है—जैसा कि मिशनरीज ऑफ चैरिटी के मामले में देखा गया—या UAPA जैसे कानूनों के आक्रामक इस्तेमाल पर निर्भर करती है, तो 'प्रक्रिया' ही अपने आप में एक सजा बन जाती है। न्यायपालिका का हस्तक्षेप एक आवश्यक जांच के रूप में कार्य करता है, जो एजेंसियों को याद दिलाता है कि आरोपों को अटकलों या प्रक्रियात्मक दांव-पेच के बजाय ठोस सबूतों का समर्थन प्राप्त होना चाहिए।
इसका व्यापक निहितार्थ यह है कि सरकारी एजेंसियां किस तरह मामले शुरू करती हैं और उन्हें कैसे आगे बढ़ाती हैं, इस पर न्यायिक जांच बढ़ रही है। NewsClick मामले को 'प्रक्रिया का दुरुपयोग' करार देकर, अदालत ने एक मिसाल कायम की है जिसे भविष्य में विदेशी फंडिंग और संस्थागत निगरानी से जुड़े कानूनी मामलों में उद्धृत किया जाएगा। जैसे-जैसे ये मामले समाप्त हो रहे हैं, वे जांच तंत्र के लिए एक प्रासंगिक सवाल छोड़ गए हैं: एक ऐसे लंबे खिंचने वाले मामले की कीमत क्या है जो अंततः न्यायिक समीक्षा की कसौटी पर खरा नहीं उतर पाता?
अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।