'कॉकरोच' की पुकार: NEET संकट के लिए जवाबदेही की मांग
आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को एक-एक करोड़ का मुआवजा दें – मोदी को 'कॉकरोच' पार्टी का पत्र
जैसे-जैसे NEET विवाद गहरा रहा है, एक अनूठी राजनीतिक आवाज सामने आई है, जो उन छात्रों के परिवारों के लिए न्याय मांग रही है जिन्होंने आत्महत्या की है।
कक्षा की शांति आमतौर पर कलम की सरसराहट से भरी होती है; लेकिन हाल ही में, यह एक बढ़ती हुई, हताश चीख से बाधित हो रही है। NEET परीक्षा के इर्द-गिर्द मचे हंगामे के बीच, 'कॉकरोच जनता पार्टी' के संस्थापक अभिजीत दिपके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक तीखा पत्र लिखा है। वह केवल नीतिगत बदलाव नहीं मांग रहे हैं; वह एक ठोस मानवीय प्रतिक्रिया की मांग कर रहे हैं: परीक्षा की प्रणालीगत विफलताओं के कारण आत्महत्या करने वाले प्रत्येक छात्र के परिवार के लिए 1 करोड़ रुपये का मुआवजा।
यह केवल वित्तीय सहायता की अपील नहीं है; यह संस्थागत जवाबदेही की एक तीखी आलोचना है। दिपके का पत्र एक गंभीर आंकड़े को उजागर करता है—हाल के सप्ताहों में 11 छात्रों ने आत्महत्या की है, जिनमें से पांच मौतें केवल पिछले 48 घंटों में हुई हैं। ये केवल स्प्रेडशीट पर लिखे आंकड़े नहीं हैं। ये उन परिवारों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्होंने शिक्षा ऋण लिया और अपने बच्चों के भविष्य के लिए अपनी जीवन भर की जमा-पूंजी लगा दी, लेकिन कथित पेपर लीक और परीक्षा की अखंडता के पतन के बाद वे पूरी तरह से बर्बाद हो गए।
जवाबदेही की मांग
'कॉकरोच जनता पार्टी' देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों में सबसे आगे रही है और लगातार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रही है। पार्टी का रुख स्पष्ट है: यदि सिस्टम विफल होता है, तो सत्ता में बैठे लोगों को इसके परिणामों के लिए जवाबदेह होना चाहिए। नरेंद्र मोदी को लिखा गया दिपके का पत्र विश्वासघात की भावना को रेखांकित करता है, यह सुझाव देते हुए कि वर्तमान संकट भारत के युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य और उनके भविष्य के लिए सीधा खतरा है।
मुआवजे की तत्काल मांग से परे, यह स्थिति उन उम्मीदवारों में व्याप्त गहरी चिंता को दर्शाती है। हाईकोर्ट पहले ही हस्तक्षेप कर चुका है और लीक हुई सामग्री के प्रसार को रोकने के लिए टेलीग्राम पर प्रतिबंध लगाने के केंद्र के फैसले को बरकरार रखा है, फिर भी विश्वास का संकट बना हुआ है। जिन माता-पिता ने सब कुछ खो दिया है, उनके लिए न्याय की मांग राजनीतिक नाटक के बारे में नहीं है, बल्कि यह स्वीकार करने के बारे में है कि निष्पक्ष परीक्षा आयोजित करने में राज्य की विफलता ने उनसे उनकी सबसे कीमती संपत्ति छीन ली है।
यह क्यों मायने रखता है: बड़ी तस्वीर
यह घटना भारत के प्रतिस्पर्धी परीक्षा पारिस्थितिकी तंत्र के अत्यधिक दबाव वाले माहौल की एक गंभीर याद दिलाती है। जब कोई प्रणाली इतनी बोझिल और भ्रष्टाचार के प्रति संवेदनशील हो जाती है कि वह उन लोगों की भावना को ही तोड़ देती है जिनकी उसे जांच करनी चाहिए, तो सामाजिक लागत असहनीय हो जाती है। सरकार इन विशिष्ट मांगों को स्वीकार करे या न करे, 'कॉकरोच जनता पार्टी' जैसे अपरंपरागत राजनीतिक आंदोलनों का उदय यह संकेत देता है कि युवा अपनी हताशा को व्यक्त करने के तरीके बदल रहे हैं। पैटर्न स्पष्ट है: ध्यान केवल 'पुनः परीक्षा' से हटकर प्रशासनिक मशीनरी को उनकी चूक की मानवीय कीमत के लिए जिम्मेदार ठहराने की ओर बढ़ रहा है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है, तो भारत में शैक्षिक सुधारों पर चर्चा कहीं अधिक आक्रामक और केवल प्रक्रियात्मक सुधारों के बजाय जवाबदेही पर केंद्रित हो जाएगी।
कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।