तमिलनाडु की शराब नीति: 717 दुकानें बंद होने के बावजूद कारोबार क्यों जारी?
बंद मगर चालू | तमिलनाडु में शराब की दुकानों पर ताले का सच

राज्य सरकार द्वारा 717 खुदरा दुकानों को बंद करने के बावजूद, स्थानीय निवासियों का कहना है कि शराब के सेवन से होने वाली सार्वजनिक परेशानी पहले जैसी ही बनी हुई है।
शराबबंदी का भ्रम
जब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने 12 मई को स्कूलों और धार्मिक स्थलों के पास स्थित 717 शराब की दुकानों को बंद करने का आदेश दिया, तो इस कदम को जनहित की दिशा में एक बड़ा फैसला बताया गया। एक महीने के भीतर, इन विशिष्ट Tasmac दुकानों के शटर वाकई गिर गए। हालांकि, राज्य भर के कई निवासियों के लिए यह जीत काफी हद तक प्रतीकात्मक ही है। शराब की उपलब्धता कम होने के बजाय, इस कदम ने ग्राहकों को बस अगली नजदीकी सरकारी दुकान की ओर धकेल दिया है, जिससे सार्वजनिक उपद्रव और आबकारी राजस्व पर निर्भरता जैसे मुद्दे जस के तस बने हुए हैं।
राजनीतिक वादों का चक्र
यह हालिया कवायद तमिलनाडु की पुरानी राजनीतिक परंपरा का ही एक नया अध्याय है। जनता की भावनाओं को शांत करने के लिए चुनिंदा दुकानों को बंद करने की रणनीति का इस्तेमाल वर्षों से विभिन्न सरकारें करती आ रही हैं। 2016 में, पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता ने चरणबद्ध तरीके से शराबबंदी शुरू की और 500 दुकानें बंद कीं। उनके उत्तराधिकारी एडप्पादी के. पलानीस्वामी ने भी अगले वर्ष 500 और दुकानें बंद कीं। 2023 तक, बिजली और मद्यपान निषेध मंत्री वी. सेंथिल बालाजी ने 500 और दुकानों को बंद करने की घोषणा की। उद्योग विशेषज्ञों का तर्क है कि हालांकि ये घोषणाएं छुट्टियों के दौरान सुर्खियां बटोरती हैं—जैसे कि क्रिसमस, ईस्टर या अन्य सार्वजनिक छुट्टियों पर शराब की दुकानें खुली रहनी चाहिए या बंद, इस पर होने वाली बहस—लेकिन ये राज्य की शराब बिक्री पर संरचनात्मक निर्भरता को संबोधित करने में विफल रहती हैं।
जमीनी हकीकत बनाम नीति
जमीनी स्तर के आकलन से सरकारी आदेशों और सामुदायिक जरूरतों के बीच का अंतर साफ झलकता है। उदाहरण के तौर पर, चेन्नई के वेलाचेरी इलाके में बालकृष्ण नगर के निवासी वर्षों से Tasmac दुकान संख्या 928 को हटाने की मांग कर रहे हैं। आवासीय केंद्रों और स्थानीय मास ट्रांजिट स्टेशन के करीब होने के बावजूद, यह दुकान विवाद का केंद्र बनी हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब तक सरकार उन विशिष्ट स्थानों को नहीं हटाती जो दैनिक परेशानी का कारण बनते हैं, तब तक व्यापक और दिखावटी बंदी से जनता की शिकायतों का समाधान नहीं होगा। आलोचकों का तर्क है कि मौजूदा सरकार के कार्य भी अपने पूर्ववर्तियों के समान ही हैं: कागजों पर 'बंद' का दर्जा बनाए रखना, जबकि यह सुनिश्चित करना कि समग्र व्यावसायिक नेटवर्क कहीं और 'खुला' और लाभदायक बना रहे।
व्यापक संदर्भ
सार्वजनिक स्वास्थ्य और राज्य की राजकोषीय निर्भरता के बीच संतुलन बनाने का संघर्ष भारतीय नीति में एक बार-बार आने वाला विषय है। जहां अन्य राज्य ईस्टर या क्रिसमस जैसे त्योहारों के दौरान संचालन के समय को बदलने के साथ जूझते हैं, वहीं तमिलनाडु की चुनौती सीधे तौर पर सरकार के खुदरा व्यापार पर नियंत्रण से जुड़ी है। जैसे-जैसे तमिलगा वेट्री कड़गम (TVK) सरकार आगे बढ़ रही है, नागरिकों की निरंतर मांग यह बताती है कि जब तक कोई व्यापक नीति नहीं बनाई जाती, तब तक सैकड़ों दुकानों को बंद करने को सार्थक सुधार के बजाय एक अस्थायी समायोजन के रूप में ही देखा जाएगा। फिलहाल, शराब पीने वालों का एक दुकान से दूसरी दुकान की ओर पलायन इस बात की याद दिलाता है कि मांग अभी भी मजबूत है, चाहे कितने भी शटर क्यों न गिरा दिए जाएं।
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