सुप्रीम कोर्ट ने 1993 बोबाजार विस्फोट के दोषी की रिहाई पर दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट ने 1993 बोबाजार विस्फोट के दोषी की समय से पहले रिहाई के दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाई
सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल सरकार की तत्काल अपील के बाद 1993 के कोलकाता विस्फोट के मुख्य दोषी मोहम्मद राशिद खान की समय से पहले रिहाई पर रोक लगा दी है।
1993 के विनाशकारी बोबाजार विस्फोट के मास्टरमाइंड माने जाने वाले मोहम्मद राशिद खान की रिहाई को लेकर कानूनी लड़ाई इस सप्ताह सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई। जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसने 77 वर्षीय दोषी की समय से पहले रिहाई का रास्ता साफ कर दिया था। इस रोक ने उस विवादास्पद बहस को फिलहाल थाम दिया है कि क्या दशकों की कैद आतंकी अपराध की गंभीरता से बड़ी हो सकती है।
5 जून के अपने फैसले में, दिल्ली हाई कोर्ट ने न्याय के सुधारात्मक सिद्धांत का हवाला दिया था। अदालत ने गौर किया कि खान 33 साल से अधिक समय जेल में बिता चुका है। कोर्ट ने कहा कि उसकी अधिक उम्र, खराब स्वास्थ्य और जेल में लंबे समय तक अच्छा आचरण यह दर्शाता है कि अब वह समाज के लिए खतरा नहीं है। पीठ ने तर्क दिया था कि एक बुजुर्ग दोषी को जेल में रखने का कोई औचित्य नहीं है, जबकि उसने सजा का कानूनी मानदंड पूरा कर लिया है।
राज्य की चुनौती
हालांकि, पश्चिम बंगाल सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। राज्य का प्रतिनिधित्व करते हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने 1993 की त्रासदी की भयावहता पर जोर दिया। खान के घर में छिपाए गए विस्फोटकों के जखीरे के कारण हुए बोबाजार विस्फोट में 69 लोगों की मौत हो गई थी और 100 से अधिक लोग घायल हुए थे, साथ ही दो इमारतें पूरी तरह ढह गई थीं। यह विस्फोट बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद सांप्रदायिक तनाव के डर से किया गया था।
सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने इसमें शामिल लोगों की अलग-अलग भूमिकाओं पर गौर किया। जहां बचाव पक्ष ने सह-आरोपी पन्नालाल जायसवाल के साथ समानता दिखाने की कोशिश की, जिसे वर्षों पहले छूट मिल गई थी, वहीं पीठ ने कहा कि विस्फोट के मुख्य सूत्रधार के रूप में खान का मामला अलग है। अदालत ने अब खान को औपचारिक नोटिस जारी कर मामले में आगे की कार्यवाही से पहले उसका जवाब मांगा है।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है
यह मामला न्यायिक दया और आतंकी अपराधों के लिए न्याय सुनिश्चित करने के राज्य के कर्तव्य के बीच के टकराव को उजागर करता है। हालांकि सुधारात्मक दृष्टिकोण आधुनिक आपराधिक न्यायशास्त्र की आधारशिला है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि जब TADA (UAPA का पूर्ववर्ती कानून) के तहत दोषसिद्धि की बात आती है, तो रिहाई का पैमाना बहुत ऊंचा रहता है। 'मास्टरमाइंड' को हिरासत में रखने पर राज्य का जोर यह संकेत देता है कि सामूहिक जनहानि वाले आतंकी हमलों को अन्य आजीवन कारावास के दोषियों जैसी उदारता से नहीं देखा जा सकता। जैसे-जैसे कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, यह मामला इस मिसाल को और मजबूत करेगा कि अपराध की प्रकृति समय से पहले रिहाई में एक बड़ी बाधा बनी रह सकती है।
प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।