पाकिस्तान जासूसी मामला: सुप्रीम कोर्ट ने यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा की जमानत याचिका खारिज की
पाकिस्तान के लिए जासूसी करने की आरोपी यूट्यूबर को सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली राहत

शीर्ष अदालत ने हिसार की रहने वाली ट्रैवल व्लॉगर को राहत देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने विदेशी खुफिया एजेंटों के साथ उसकी कथित संलिप्तता के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई है।
सुप्रीम कोर्ट ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के लिए काम करने की आरोपी हिसार की यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा को जमानत देने से साफ इनकार कर दिया है। सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में कोई समझौता नहीं किया जा सकता। कोर्ट का यह फैसला पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखता है, जिसमें 33 वर्षीय कंटेंट क्रिएटर को जमानत देने से मना कर दिया गया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि उन पर लगे आरोप 'बेहद गंभीर' हैं और मामले की पूरी सुनवाई होनी चाहिए।
'Travel-with-Jo' नाम का ट्रैवल चैनल चलाने वाली मल्होत्रा को पुलिस ने पिछले साल 16 मई को गिरफ्तार किया था। जांचकर्ताओं का आरोप है कि उसे पाकिस्तानी खुफिया एजेंटों द्वारा व्यवस्थित तरीके से तैयार किया गया था और वह नई दिल्ली स्थित पाकिस्तान उच्चायोग से जुड़े लोगों के संपर्क में थी। इस मामले में एहसान-उर-रहीम उर्फ दानिश का नाम मुख्य रूप से सामने आया है, जो पाकिस्तान उच्चायोग का कर्मचारी था और जिसे भारत सरकार ने मई 2023 में जासूसी के आरोपों के चलते निष्कासित कर दिया था।
फोरेंसिक साक्ष्य और सुरक्षा चिंताएं
अभियोजन पक्ष के अनुसार, मल्होत्रा के फोन और लैपटॉप जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की फोरेंसिक जांच में कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर व्यापक बातचीत का खुलासा हुआ है। पुलिस का दावा है कि इन संदेशों में हिमाचल प्रदेश के पंडोह बांध और अन्य महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रतिष्ठानों के वीडियो फुटेज शामिल थे। हालांकि बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि मल्होत्रा के पास कोई वर्गीकृत सैन्य या रक्षा रहस्य होने का सीधा सबूत नहीं है, लेकिन अभियोजन पक्ष ने कहा कि उसकी गतिविधियों का 'परिस्थितिजन्य ताना-बाना' और विदेशी खुफिया एजेंटों के साथ लगातार संपर्क देश की संप्रभुता के लिए गंभीर खतरा है।
इस मामले में कानूनी चुनौतियां लगातार बनी हुई हैं। मल्होत्रा की कानूनी टीम ने पहले भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के लागू होने पर सवाल उठाए थे, यह तर्क देते हुए कि ये आरोप राजद्रोह के उन प्रावधानों जैसे हैं जो अभी न्यायिक समीक्षा के दायरे में हैं। हालांकि, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने इन तर्कों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट का हवाला देते हुए कहा कि रिहा होने पर आरोपी सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकती है या चल रही जांच में बाधा डाल सकती है।
व्यापक जांच
मल्होत्रा के खिलाफ यह मामला जासूसी गतिविधियों पर रखी जा रही व्यापक सुरक्षा निगरानी का हिस्सा है। जांचकर्ताओं ने बताया कि उसकी यात्राओं का इतिहास, जिसमें पाकिस्तान की दो यात्राएं शामिल हैं, जहां उसने कथित तौर पर 'शाकिर' और 'राणा शहबाज' नामक खुफिया अधिकारियों से मुलाकात की थी, ने सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क कर दिया था। हालांकि उसके समर्थकों ने अक्सर उसके ऑनलाइन कंटेंट को शांति और सीमा पार संवाद का जरिया बताया है, लेकिन कानून प्रवर्तन एजेंसियों का मानना है कि उसकी गतिविधियां पूरी तरह से गुप्त थीं।
जैसे-जैसे मामला मुकदमे की ओर बढ़ रहा है, हिसार की अदालत उसकी न्यायिक हिरासत बढ़ाने की प्रक्रिया देख रही है। फिलहाल, न्यायपालिका का रुख स्पष्ट है: व्यक्तिगत स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है, लेकिन यह विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ देश की अखंडता की रक्षा करने की राज्य की जिम्मेदारी से ऊपर नहीं है। यह कानूनी लड़ाई संवेदनशील भू-राजनीतिक सीमाओं के पार काम करने वाले डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स की निगरानी की बढ़ती जटिलता को उजागर करती है।
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