Politicalpedia
राज्य

यूपी में बिजली उपभोक्ताओं को बड़ा झटका: 47 लाख लोगों का चुपचाप बढ़ाया गया लोड, सब्सिडी हुई खत्म

यूपी में 47 लाख बिजली उपभोक्ताओं को बड़ा झटका, बिना बताए बढ़ा दिया गया लोड, सब्सिडी से हुए बाहर

द्वारा प्रिया नायरप्रकाशित 5 जुलाई 2026· 2 मिनट पढ़ें
यूपी में बिजली लोड में बढ़ोतरी: 47 लाख उपभोक्ता सब्सिडी से बाहर
यूपी में बिजली लोड में बढ़ोतरी: 47 लाख उपभोक्ता सब्सिडी से बाहर

बिना किसी पूर्व सूचना के, राज्य विद्युत निगम ने एकतरफा तरीके से लाखों उपभोक्ताओं का स्वीकृत लोड बढ़ा दिया है, जिससे हजारों कमजोर परिवार सब्सिडी के दायरे से बाहर हो गए हैं।

उत्तर प्रदेश के 47 लाख बिजली उपभोक्ताओं के लिए आया ताजा बिल सिर्फ एक कागजी दस्तावेज नहीं, बल्कि एक बड़ा झटका है। भूपेंद्र सिंह जैसे पत्रकारों की हालिया रिपोर्टों से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन ने चुपचाप इन उपभोक्ताओं का स्वीकृत लोड बढ़ा दिया है। इस कदम ने राज्य के सबसे गरीब परिवारों में से लगभग 25 प्रतिशत को उनकी जरूरी ऊर्जा सब्सिडी से वंचित कर दिया है।

इसका असर तुरंत और प्रतिकूल पड़ा है। ग्रामीण परिवारों पर अब लगभग ₹165 का अतिरिक्त मासिक बोझ पड़ रहा है, जबकि शहरी कम आय वाले उपभोक्ताओं को ₹435 तक की भारी बढ़ोतरी का सामना करना पड़ रहा है। पहले से ही तंग बजट में चल रहे परिवारों के लिए, यह राशि उनके मासिक खर्च पर एक बड़ा प्रहार है।

नियामक प्रोटोकॉल का उल्लंघन

राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने इस कदम को नियामक आयोग के टैरिफ आदेश का खुला उल्लंघन बताया है। स्थापित नियमों के अनुसार, यदि किसी उपभोक्ता का लोड उपयोग तीन महीने तक उनकी स्वीकृत क्षमता से अधिक रहता है, तो विभाग को औपचारिक नोटिस जारी करना अनिवार्य है। उन्हें उपभोक्ता को सूचित करना होता है कि उनका लोड अपग्रेड किया जा रहा है—उदाहरण के लिए, एक किलोवाट से दो किलोवाट—और यह प्रक्रिया पूरी होने से पहले उनकी सहमति जरूरी है।

इस नोटिस अवधि को दरकिनार करके, निगम ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी की है। उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा का तर्क है कि यह केवल एक प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि बिजली उपभोक्ताओं को मिले कानूनी संरक्षण की अवहेलना है। परिषद अब इस मामले की उच्च स्तरीय जांच और राज्य सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग कर रही है।

स्मार्ट मीटर का जाल

स्मार्ट मीटर का उपयोग करने वालों के लिए यह संकट और भी गहरा गया है। हालांकि केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय के अधिकारियों ने पहले लोकसभा में आश्वासन दिया था कि स्मार्ट मीटर उपयोगकर्ताओं को 'अधिकतम मांग' (मैक्सिमम डिमांड) जुर्माने से छूट दी जाएगी, लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग दिख रही है।

कई उपभोक्ता दोहरी मार झेल रहे हैं: उन पर डिमांड पेनल्टी भी लगाई जा रही है और साथ ही बिना सहमति के उनका स्वीकृत लोड भी बढ़ा दिया गया है। प्रभावित उपभोक्ताओं में लगभग 50 प्रतिशत स्मार्ट मीटर धारक हैं, जिससे इस प्रणालीगत खामी का दायरा बहुत बड़ा हो गया है।

बड़ी तस्वीर: यह क्यों मायने रखता है

यह घटना राज्य की उपयोगिता प्रबंधन में एक चिंताजनक प्रवृत्ति को उजागर करती है, जहां प्रशासनिक 'दक्षता' अक्सर पारदर्शिता की कीमत पर आती है। जब बिना किसी पूर्व सूचना के उपभोक्ता खातों में बड़े पैमाने पर स्वचालित बदलाव किए जाते हैं, तो इससे सार्वजनिक सेवा वितरण में लोगों का भरोसा कम होता है।

इस समूह में पहचाने गए 1.70 लाख बीपीएल परिवारों पर पड़े तत्काल वित्तीय बोझ से परे, यह पैटर्न बताता है कि बिजली प्रदाता टैरिफ आदेशों की व्याख्या कैसे करते हैं, इस पर सख्त निगरानी की आवश्यकता है। यदि राज्य चुपचाप लोड अपग्रेड के माध्यम से राजस्व वसूली को प्राथमिकता देना जारी रखता है, तो वह उस वर्ग को ही नाराज करने का जोखिम उठा रहा है जिसे सब्सिडी योजना के तहत संरक्षित किया जाना था। सरकार की प्रतिक्रिया यह तय करेगी कि यह एक अलग नौकरशाही की अति है या राज्य द्वारा पावर ग्रिड के प्रबंधन में एक प्रणालीगत बदलाव।

द्वारा प्रिया नायर
राजनीतिक संवाददाता

प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।