कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से संभला बाजार, सेंसेक्स और निफ्टी में जोरदार रिकवरी
कच्चे तेल के दाम घटने और वैश्विक संकेतों के दम पर शेयर बाजार में शुरुआती कारोबार में तेजी
शुरुआती कारोबार में आई यह तेजी निवेशकों के लौटे भरोसे का संकेत है, क्योंकि तेल की कीमतों में नरमी और वैश्विक बाजार से मिले सकारात्मक संकेतों ने हालिया उतार-चढ़ाव को संतुलित कर दिया है।
सोमवार की सुबह दलाल स्ट्रीट पर सतर्क आशावाद का माहौल रहा, जहां बेंचमार्क सूचकांकों ने पिछले सप्ताह के नुकसान की भरपाई की। शुरुआती कारोबार में BSE सेंसेक्स 407.12 अंक चढ़कर 77,210.02 पर पहुंच गया, जबकि NSE निफ्टी 114.75 अंक की बढ़त के साथ 24,129.95 पर कारोबार करता दिखा। यह रिकवरी शुक्रवार की गिरावट से एक बड़ा बदलाव है, जब सेंसेक्स 607 अंक टूट गया था, जो भारी बिकवाली के बाद बाजार में बनी घबराहट को दर्शाता है।
इस तेजी के पीछे एक बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतों में नरमी है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए हमेशा से एक चिंता का विषय रहा है। जब तेल की कीमतें कम होती हैं, तो भारत जैसे ऊर्जा-आयात करने वाले देशों के लिए राजकोषीय स्थिति बेहतर होती है, जिससे बाजार की धारणा को तत्काल राहत मिलती है। इस व्यापक आर्थिक मजबूती और रिलायंस इंडस्ट्रीज व HDFC बैंक जैसे दिग्गज शेयरों में खरीदारी ने बाजार को फिर से हरे निशान में लाने का काम किया है।
वैश्विक संकेत और लिक्विडिटी का प्रवाह
बाजार की यह मजबूती केवल घरेलू कारकों पर निर्भर नहीं है। हालांकि शुक्रवार को जूनटीन (Juneteenth) की छुट्टी के कारण अमेरिकी बाजार बंद थे, लेकिन नैस्डैक और S&P 500 के पिछले सत्र के मजबूत प्रदर्शन—जो सेमीकंडक्टर रैली से प्रेरित थे—ने बाजार को सहारा दिया। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भी भारतीय विकास गाथा पर अपना भरोसा बनाए रखा है और शुक्रवार के आंकड़ों के अनुसार बाजार में 4,859.07 करोड़ रुपये का निवेश किया है।
पूरे एशिया में इन वैश्विक संकेतों पर मिली-जुली लेकिन सकारात्मक प्रतिक्रिया देखी गई। जहां जापान और दक्षिण कोरिया के सूचकांक ऊपर चढ़े, वहीं हांगकांग का हैंग सेंग सुस्त रहा। व्यापारी राजनयिक घटनाक्रमों पर भी नजर बनाए हुए हैं, विशेष रूप से अमेरिका-ईरान समझौते के रोडमैप पर, जो यदि 60-दिवसीय समयसीमा के भीतर रहता है, तो ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को और अधिक स्थिर कर सकता है।
यह क्यों मायने रखता है
आम निवेशक के लिए, यह रिकवरी इस बात की याद दिलाती है कि भारतीय इक्विटी बाजार वैश्विक ऊर्जा गतिशीलता से कितनी मजबूती से जुड़े हैं। बाजार का चलन अभी भी 'गिरावट पर खरीदारी' (buy-on-dips) का बना हुआ है, जहां संस्थागत निवेशक सुधार का लाभ उठाकर ब्लू-चिप शेयरों को जमा कर रहे हैं। हालांकि अभी पूरा ध्यान तेल की कीमतों और तिमाही नतीजों पर है, लेकिन बाजार की अस्थिरता यह बताती है कि भू-राजनीतिक स्थिरता या फेडरल रिजर्व की नीतिगत बयानबाजी में किसी भी बदलाव के प्रति बाजार संवेदनशील रहेगा। जैसे-जैसे हम वित्तीय चक्र के अगले चरण में बढ़ रहे हैं, इन सूचकांकों का अपनी बढ़त बनाए रखना मुख्य रूप से विदेशी लिक्विडिटी और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के जारी रहने पर निर्भर करेगा।
अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।