कर्नाटक में विधान परिषद चुनाव से पहले फिर लौटी 'रिसॉर्ट पॉलिटिक्स'
कर्नाटक: विधानपरिषद चुनाव से पहले रिसॉर्ट में विधायकों को ठहराने पर भाजपा ने कांग्रेस पर साधा निशाना
विधान परिषद चुनाव नजदीक आते ही कांग्रेस पार्टी द्वारा अपने विधायकों को रिसॉर्ट में शिफ्ट करने के फैसले ने भाजपा के साथ जुबानी जंग तेज कर दी है।
बेंगलुरु के बाहरी इलाके, विशेष रूप से बिदादी के लग्जरी रिसॉर्ट्स, एक बार फिर हाई-प्रोफाइल राजनीतिक दांव-पेंच का केंद्र बन गए हैं। 18 जून को होने वाले विधान परिषद चुनावों से पहले, सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ने अपने विधायकों को एक रिसॉर्ट में भेज दिया है। यह 'रिसॉर्ट पॉलिटिक्स' का एक पुराना तरीका है, जिसका मकसद अपने कुनबे को एकजुट रखना होता है। हालांकि पार्टी का कहना है कि यह चुनावी प्रशिक्षण के लिए एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन विपक्षी दल को इस पर हमला करने का नया मौका मिल गया है।
राज्य भाजपा अध्यक्ष बी.वाई. विजयेंद्र ने इस कदम पर निशाना साधते हुए इसे आंतरिक असुरक्षा का संकेत बताया। विजयेंद्र ने तंज कसते हुए कहा, "यह हैरानी की बात है कि सत्ता में आने के महज कुछ समय बाद ही मुख्यमंत्री को अपने ही विधायकों पर भरोसा नहीं रहा।" उन्होंने सवाल किया कि स्पष्ट बहुमत वाली सरकार को आखिर विधायकों को इस तरह कैद करने की जरूरत क्यों पड़ रही है।
एकांतवास के पीछे की रणनीति
कांग्रेस के लिए दांव बहुत बड़ा है। सात सीटों के लिए होने वाले चुनाव में आठ उम्मीदवार मैदान में हैं और पार्टी पांच सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है। रिसॉर्ट के भीतर का माहौल काफी गंभीर है। बुधवार को पूरा ध्यान मतदान की बारीकियों पर रहा। विधायकों को मॉक-वोटिंग का अभ्यास कराया गया, ताकि वरीयता वाले वोटों को गणितीय सटीकता के साथ डाला जा सके। ऐसे चुनाव में जहां हर एक वोट की कीमत होती है, पार्टी एक भी अमान्य वोट या क्रॉस-वोटिंग की गलती बर्दाश्त नहीं कर सकती।
जहां कांग्रेस आंतरिक अनुशासन पर ध्यान केंद्रित कर रही है, वहीं भाजपा पूरी तरह बेफिक्र नजर आ रही है। विजयेंद्र ने दावा किया कि उनकी पार्टी "पूरी तरह निश्चिंत" है और उन्हें भरोसा है कि उनके दोनों उम्मीदवार बिना किसी रिसॉर्ट पॉलिटिक्स के आसानी से जीत दर्ज करेंगे।
आर्थिक संकट की आहट
विधान परिषद चुनाव की खींचतान के बीच, आर्थिक चिंताओं ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया है। भाजपा ने रिसॉर्ट में विधायकों के जमावड़े का इस्तेमाल सरकार की प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं—'गृह लक्ष्मी' और 'गृह ज्योति'—पर सवाल उठाने के लिए किया है।
विजयेंद्र ने दावा किया कि राज्य गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार तकनीकी बाधाएं पैदा कर रही है ताकि 1.60 लाख से अधिक करदाताओं को इन कल्याणकारी लाभों से बाहर किया जा सके। उन्होंने नए आवेदनों की मांग को सरकारी खजाने पर बढ़ते वित्तीय दबाव को छिपाने की एक कोशिश करार दिया।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
यह घटना दर्शाती है कि राज्य में राजनीतिक सहमति कितनी नाजुक है, भले ही सरकार के पास आरामदायक बहुमत हो। 'रिसॉर्ट पॉलिटिक्स' का मजाक भले ही उड़ाया जाए, लेकिन यह गुप्त मतदान वाले चुनावों में पार्टियों के भीतर की गहरी चिंता को उजागर करता है। बिदादी में कांग्रेस का यह कड़ा प्रशिक्षण उसे पांच सीटें दिला पाता है या नहीं, यह सरकार की अल्पकालिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण होगा। वहीं, भाजपा का कल्याणकारी योजनाओं में प्रशासनिक बाधाओं को 'आर्थिक संकट' से जोड़ना यह बताता है कि वे सरकार के वित्तीय प्रबंधन को लेकर एक लंबी लकीर खींचने की तैयारी में हैं, ताकि चुनाव नतीजों के बाद भी राजनीतिक दबाव बना रहे।
रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।