विधान परिषद में सत्ता का नया समीकरण: संख्या बल बढ़ते ही कांग्रेस की नजर सभापति पद पर
विधान परिषद में कांग्रेस का आंकड़ा 43 तक पहुंचा! बसवराज होरट्टी और प्राणेश के इस्तीफे की उम्मीद; क्या है नया राजनीतिक गणित?
विधान परिषद में संख्या बल अपने पक्ष में होने के बाद, कांग्रेस आगामी मंत्रिमंडल विस्तार के साथ-साथ उच्च सदन के नेतृत्व में भी बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है।
बेंगलुरु के सत्ता के गलियारों में हलचल तेज है क्योंकि कांग्रेस पार्टी कर्नाटक विधान परिषद में अपनी बढ़ती ताकत का लाभ उठाने की तैयारी कर रही है। जहां सबकी नजरें आगामी मंत्रिमंडल विस्तार पर टिकी हैं, वहीं एक और महत्वपूर्ण बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो गई है: 75 सदस्यीय उच्च सदन में सभापति और उप-सभापति के पदों पर कब्जा करना। जुलाई के अंत तक सरकार का आंकड़ा 43 तक पहुंचने की उम्मीद है, जिसके चलते वर्तमान पदाधिकारी बसवराज होरट्टी और एम.के. प्राणेश के सामने अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर संकट खड़ा हो गया है।
नियंत्रण का गणित
यह गणित काफी सीधा है। कांग्रेस के पास पहले 37 सदस्य थे, लेकिन हाल ही में विधानसभा कोटे की सात सीटों पर हुए द्विवार्षिक चुनावों के बाद उनकी संख्या बढ़कर 39 हो गई है। असली बदलाव 21 जुलाई को आएगा, जब सरकार पांच मनोनीत रिक्तियों को भरेगी। इससे कांग्रेस का आंकड़ा 43 तक पहुंच जाएगा, जो 38 के साधारण बहुमत के आंकड़े से काफी अधिक है। इसके विपरीत, भाजपा-जेडी(एस) का 'दोस्ती' गठबंधन, जिसके पास कभी 36 सीटें थीं, अब घटकर 34 पर आ गया है। जुलाई में भाजपा के चार मनोनीत सदस्यों के सेवानिवृत्त होने के बाद यह संख्या 30 तक गिर सकती है।
विपक्ष के लिए अब बहुत कम गुंजाइश बची है। सूत्रों का कहना है कि बसवराज होरट्टी और एम.के. प्राणेश दोनों से स्वेच्छा से पद छोड़ने की उम्मीद है, ताकि वे बहुमत का सम्मान करते हुए नई परंपरा का पालन करें। यदि वे पद छोड़ने से इनकार करते हैं, तो कांग्रेस अगले सत्र में अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी में है, जिससे दोनों नेताओं को सार्वजनिक रूप से पद से हटना पड़ सकता है।
मंत्रिमंडल विस्तार और 'सभाई' रणनीति
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया 23 जून के बाद पार्टी आलाकमान से चर्चा करने के लिए दिल्ली जाने वाले हैं। इस primary मिशन का उद्देश्य 20 लंबित मंत्री पदों की सूची को अंतिम रूप देना है, जैसा कि हालिया original राजनीतिक article में बताया गया है। हालांकि, पार्टी नेताओं की उच्च स्तरीय sabhai (बैठक) में परिषद के शीर्ष दो पदों को लेकर चल रहे गतिरोध को सुलझाने की भी उम्मीद है।
पार्टी के भीतर मंत्री बनने के इच्छुक नेताओं की लंबी कतार को देखते हुए, नेतृत्व परिषद के पदों को एक रणनीतिक विकल्प के रूप में देख रहा है। पार्टी के वरिष्ठ दिग्गजों को इन भूमिकाओं में नियुक्त करके, आलाकमान क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों को संतुलित कर सकता है, जिन्हें सीमित कैबिनेट स्लॉट में जगह नहीं मिल पाई है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है: व्यापक परिप्रेक्ष्य
यह केवल कुर्सी बदलने का खेल नहीं है, बल्कि विधायी नियंत्रण को फिर से हासिल करने की कवायद है। पिछली सरकार के दौरान, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने जनता परिवार के दिग्गज बसवराज होरट्टी के प्रति नरम रुख अपनाया था। इससे कांग्रेस के भीतर असंतोष पैदा हुआ था और कुछ विधायकों ने आलाकमान से आक्रामक रुख न अपनाने की शिकायत भी की थी।
अब, स्पष्ट जनादेश और बहुमत के साथ, पार्टी के दोबारा हिचकिचाने की संभावना कम है। यह कदम पूर्ण विधायी नियंत्रण की ओर इशारा करता है, ताकि उच्च सदन में सरकारी कामकाज में कोई प्रक्रियात्मक बाधा न आए। विपक्ष के लिए, उनकी संख्या में गिरावट उस युग के अंत का संकेत है, जब वे परिषद में अपनी शर्तें थोप सकते थे। जैसे-जैसे सरकार अपनी योजनाओं को अंतिम रूप दे रही है, ध्यान विधानसभा के अगले सत्र से पहले दक्षता और नियंत्रण को मजबूत करने पर केंद्रित है।
प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।