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PM SHRI स्कूल: वैचारिक मतभेदों के बीच केरल का व्यावहारिक रुख

पीएम श्री में शामिल होने पर केरल का बड़ा फैसला; स्थिति स्पष्ट करने के लिए उप-समिति का गठन

द्वारा प्रिया नायरप्रकाशित 17 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
PM SHRI स्कूल: वैचारिक मतभेदों के बीच केरल का व्यावहारिक रुख
PM SHRI स्कूल: वैचारिक मतभेदों के बीच केरल का व्यावहारिक रुख

राज्य सरकार ने केंद्र सरकार की PM SHRI योजना के साथ तालमेल बिठाने और अपनी शिक्षा नीति के बीच संतुलन बनाने के लिए एक उप-समिति का गठन किया है।

PM SHRI (प्राइम मिनिस्टर स्कूल्स फॉर राइजिंग इंडिया) योजना के कार्यान्वयन को लेकर राज्य और केंद्र के बीच लंबे समय से चला आ रहा गतिरोध अब एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया है। पाठ्यक्रम की स्वायत्तता और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) को लागू करने को लेकर महीनों के विरोध के बाद, केरल सरकार ने अब एक नरम रुख अपनाया है। एक औपचारिक उप-समिति को अब बारीकियों को सुलझाने का काम सौंपा गया है, जो प्रभावी रूप से राज्य को इस केंद्र प्रायोजित पहल में शामिल होने की दिशा में ले जा रही है।

एक सोची-समझी रणनीति

LDF सरकार के लिए, उप-समिति बनाने का निर्णय वैचारिक समर्पण के बजाय एक रणनीतिक कदम है। राज्य पहले इस योजना के उस प्रावधान को लेकर आशंकित था जिसमें NEP ढांचे का सख्ती से पालन करना अनिवार्य है, क्योंकि उसे डर था कि केंद्रीय हस्तक्षेप से राज्य के अपने प्रगतिशील स्कूली मॉडल कमजोर हो सकते हैं। हालांकि, केरल शिक्षा विभाग पर सुविधाओं के आधुनिकीकरण और केंद्रीय अनुदान प्राप्त करने का दबाव है, जिसके चलते अब व्यावहारिक जरूरतें शुरुआती मतभेदों पर भारी पड़ने लगी हैं।

यह प्रक्रिया अभी शुरुआती चरण में है और उप-समिति का मुख्य उद्देश्य उन शर्तों को परिभाषित करना है जिनके तहत राज्य अपने मूल शैक्षणिक सिद्धांतों से समझौता किए बिना केंद्रीय धन स्वीकार कर सके। जानकारों का मानना है कि यह बातचीत की एक लंबी टाइमलाइन का हिस्सा है, जहां अन्य राज्यों में भी इसी तरह के गतिरोधों को विशिष्ट राज्य-स्तरीय शर्तों के माध्यम से सुलझाया गया था।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारतीय शासन में राजकोषीय निर्भरता और संघीय स्वायत्तता के बीच बढ़ते तनाव को उजागर करता है। जब केरल जैसा राज्य—जो अपनी विशिष्ट शिक्षा प्रणाली पर गर्व करता है—PM SHRI जैसी केंद्रीय परियोजना के साथ जुड़ने की पहल करता है, तो यह दर्शाता है कि इन योजनाओं से मिलने वाला वित्तीय प्रोत्साहन अब इतना बड़ा हो गया है कि राज्य के बजट उसे नजरअंदाज नहीं कर सकते।

तिरुवनंतपुरम से लेकर कासरगोड तक के जिलों में छात्रों और अभिभावकों के लिए, इसका मतलब चुनिंदा स्कूलों में बेहतर बुनियादी ढांचा और डिजिटल एकीकरण हो सकता है। हालांकि, राजनीतिक चुनौती अभी भी बरकरार है: राज्य की क्षेत्रीय शैक्षिक पहचान को छोड़े बिना केंद्रीय संसाधनों को कैसे स्वीकार किया जाए? सरकार का एक समर्पित पैनल बनाने का कदम दिखाता है कि वे बीच का रास्ता तलाश रहे हैं, ताकि इसे केंद्रीय नीति को अपनाने के बजाय सहकारी संघवाद के प्रयास के रूप में पेश किया जा सके।

आगे की राह

हालांकि योजना में शामिल होने का निर्णय एक बड़ा नीतिगत बदलाव है, लेकिन असली चुनौती इसकी बारीकियों में छिपी है। उप-समिति संभवतः समझौता ज्ञापन (MoU) के हर क्लॉज की जांच करेगी ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि स्कूल नेटवर्क पर राज्य का प्रशासनिक नियंत्रण बना रहे। क्या यह सहज एकीकरण की ओर ले जाएगा या नौकरशाही के बीच और खींचतान होगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय कितनी लचीलापन दिखाने को तैयार है।

फिलहाल, नजरें समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं। न्यूज़ साइकिल के लगातार बदलने और दांव पर लगी राजनीतिक प्रतिष्ठा को देखते हुए, सरकार बहुत सावधानी से कदम उठा रही है ताकि किसी भी अंतिम समझौते को शैक्षणिक अखंडता और राजनीतिक छवि, दोनों के नजरिए से परखा जा सके।

द्वारा प्रिया नायर
राजनीतिक संवाददाता

प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।