बांकीपुर उपचुनाव की तैयारी में पशुपति पारस: आरएलजेपी ने राजनीतिक जमीन फिर से हासिल करने का किया दावा
बांकीपुर उपचुनाव में उतरेगी आरएलजेपी: प्रत्याशी उतारने का ऐलान, पशुपति पारस राजनीति में दोबारा स्थापित होने की कोशिश में
राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (RLJP) ने आगामी बांकीपुर उपचुनाव लड़ने का इरादा जाहिर किया है। यह पशुपति कुमार पारस द्वारा अपने राजनीतिक प्रभाव को पुनर्जीवित करने का एक रणनीतिक प्रयास है।
पटना के राजनीतिक गलियारों में अभी हलचल थमी भी नहीं थी कि राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (RLJP) ने अपनी अगली चाल चल दी है। दिवंगत राम विलास पासवान की जयंती के अवसर पर पार्टी के राज्य कार्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान, कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रिंस पासवान ने घोषणा की कि पार्टी आगामी बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में अपना उम्मीदवार उतारेगी। यह घोषणा केवल चुनावी भागीदारी नहीं है, बल्कि यह पशुपति कुमार पारस द्वारा खुद को उस राजनीतिक परिदृश्य में प्रासंगिक बनाए रखने की एक सोची-समझी कोशिश है, जहां फिलहाल उनके भतीजे चिराग पासवान का दबदबा है।
इस कदम के पीछे की रणनीति
पशुपति पारस के लिए बांकीपुर उपचुनाव एक महत्वपूर्ण लिटमस टेस्ट की तरह है। 2021 में लोक जनशक्ति पार्टी के विभाजन के बाद से ही चाचा-भतीजे की यह जोड़ी दिवंगत दलित आइकन राम विलास पासवान की विरासत को लेकर आमने-सामने है। जहां चिराग पासवान ने केंद्रीय मंत्री और एनडीए के मुख्य सदस्य के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर ली है, वहीं पारस खुद को हाशिए पर पा रहे हैं और पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। बांकीपुर जैसी प्रमुख शहरी सीट पर चुनाव लड़ने का फैसला लेकर, पारस स्पष्ट रूप से यह दिखाना चाहते हैं कि उनका गुट अभी भी एक सक्रिय और मजबूत ताकत है।
उसी कार्यक्रम के दौरान, पार्टी नेतृत्व ने अपनी बात रखने के लिए राज्य के व्यापक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया। प्रिंस पासवान ने बिहार प्रशासन पर तीखा हमला बोला और विशेष रूप से हालिया 'भरत तिवारी एनकाउंटर' का मुद्दा उठाया। घटना की उच्च स्तरीय जांच की मांग करके और राज्य की कानून-व्यवस्था की आलोचना करके, RLJP खुद को वंचितों और पीड़ितों के मुखर समर्थक के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है। यह दोहरी रणनीति—चुनाव लड़ना और साथ ही शासन पर आक्रामक सवाल उठाना—उनके पारंपरिक, मुख्य रूप से दलित, समर्थक आधार के बीच अपनी जगह फिर से बनाने का एक पुराना तरीका है।
यह क्यों मायने रखता है
यह घटनाक्रम राज्य की राजनीति में एक बड़ी हलचल पैदा करने वाला है। LJP परिवार के भीतर का आंतरिक घर्षण लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है, और अब RLJP के बांकीपुर सीट पर चुनाव लड़ने के फैसले से एनडीए के भीतर सीट-शेयरिंग को लेकर दबाव और बढ़ेगा। यदि पारस चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने में सफल रहते हैं, तो यह सत्ताधारी गठबंधन के समीकरणों को जटिल बना सकता है, जिसे अब एक ही राजनीतिक परिवार की दो शाखाओं की परस्पर विरोधी महत्वाकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाना होगा।
इसके अलावा, कार्यक्रम में पारस द्वारा राम विलास पासवान के लिए 'भारत रत्न' की मांग को दोहराना उस भावनात्मक पूंजी की याद दिलाता है जिसका पार्टी लाभ उठाना चाहती है। इस मांग को दिवंगत नेता के शोषित और दलित वर्गों के प्रति आजीवन समर्पण से जोड़कर, RLJP उस नैरेटिव को फिर से हासिल करने की कोशिश कर रही है कि पासवान की विरासत उन लोगों की है जो उनके मूल मिशन को आगे बढ़ाते हैं। क्या यह चुनावी सफलता में बदल पाएगा, यह देखना बाकी है, लेकिन चुनौती देने का इरादा स्पष्ट है। बिहार की राजनीति पर नजर रखने वालों के लिए, यह एक संकेत है कि राम विलास पासवान की विरासत की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।
प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।