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ऑपरेशन टाइगर: मातोश्री पर घमासान और उद्धव ठाकरे के सामने नया संकट

वीडियो | ऑपरेशन टाइगर | "मी उद्धव ठाकरेंसोबतच राहणार" - राजाभाऊ वाजे । NDTV मराठी

द्वारा प्रिया नायरप्रकाशित 17 जून 2026· 3 मिनट पढ़ें
ऑपरेशन टाइगर: मातोश्री पर घमासान और उद्धव ठाकरे के सामने नया संकट
ऑपरेशन टाइगर: मातोश्री पर घमासान और उद्धव ठाकरे के सामने नया संकट

शिवसेना (UBT) में एक और बड़ी टूट की चर्चाओं ने पार्टी की नींव हिला दी है। उद्धव ठाकरे ने अपनी रैंक को सुरक्षित करने के लिए सांसदों की बैठक बुलाई है, जबकि शिंदे खेमा एक नए राजनीतिक विभाजन का दावा कर रहा है।

मातोश्री का माहौल तनावपूर्ण है और इसकी वजह भी साफ है। सत्ता के गलियारों में जो चर्चा दबी जुबान में शुरू हुई थी, वह अब 'ऑपरेशन टाइगर' नामक एक पूर्ण राजनीतिक संकट में बदल चुकी है। 17 जून, 2026 तक, ऐसी अटकलें तेज हैं कि शिवसेना (UBT) के संसदीय दल का एक बड़ा हिस्सा पाला बदलने की तैयारी में है। खबरों के अनुसार, उद्धव ठाकरे के प्रति वफादार नौ में से सात सांसद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले खेमे में शामिल होने की कगार पर हो सकते हैं। यह कदम महाराष्ट्र की राजनीति की तस्वीर पूरी तरह बदल सकता है।

जमीनी हकीकत

इस घटनाक्रम का समय बेहद महत्वपूर्ण है। खबरों के मुताबिक, शिंदे खेमे से जुड़ी कानूनी टीमें दिल्ली पहुंच चुकी हैं, जो यह संकेत देता है कि यह सिर्फ एक राजनीतिक चाल नहीं, बल्कि गहरी प्रक्रियात्मक तैयारी के साथ की गई रणनीति है। जहां शिंदे खेमे के नरेश म्हस्के ने यह कहकर उकसाया है कि सांसद तो 'सिर्फ ट्रेलर' हैं और अब विधायक व स्थानीय पार्षद भी कतार में हैं, वहीं ठाकरे खेमे की ओर से प्रतिक्रिया में चुनौती और एकजुटता की कोशिशें साफ दिख रही हैं।

अफवाहों के केंद्र में रहे राजाभाऊ वाजे ने सार्वजनिक रूप से उद्धव ठाकरे के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करते हुए कहा है, "मैं उद्धव ठाकरे के साथ ही रहूंगा।" हालांकि, ऐसे आश्वासनों की परीक्षा हर पल हो रही है। पार्टी नेतृत्व ने पहले ही एक औपचारिक व्हिप जारी कर सभी सांसदों को मातोश्री में एक महत्वपूर्ण बैठक में शामिल होने का निर्देश दिया है। यह कदम किसी भी संभावित आंतरिक विद्रोह को समय रहते रोकने और शक्ति प्रदर्शन के लिए उठाया गया है।

कानूनी पेच

इस कथित विभाजन के पीछे की कानूनी प्रक्रिया काफी जटिल है। एनडीटीवी पर स्थिति का विश्लेषण करते हुए संवैधानिक विशेषज्ञ असीम सरोदे ने कहा कि केवल निष्ठा बदलना दलबदल विरोधी कानूनों से बचने के लिए पर्याप्त नहीं है। अब ध्यान इस बात पर है कि क्या दलबदल करने वाले अयोग्यता से बचने के लिए आवश्यक संख्या बल के साथ एक 'अलग समूह' बना सकते हैं। बहस इस बात पर केंद्रित है कि क्या यह सीमा सदन के भीतर सांसदों पर लागू होती है या पार्टी संगठन का आंतरिक विभाजन ही मुख्य कानूनी आधार बनता है।

इस बीच, आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। वरिष्ठ नेता अरविंद सावंत एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अपनी पार्टी की स्थिरता पर पूछे गए सवालों पर काफी परेशान दिखे। वहीं, बीजेपी नेता चंद्रशेखर बावनकुले ने इस पूरे घटनाक्रम से खुद को अलग करते हुए दावा किया कि 'ऑपरेशन टाइगर' का बीजेपी से कोई लेना-देना नहीं है, भले ही इसका समय राज्य के व्यापक सत्ता संघर्ष के साथ पूरी तरह मेल खाता हो।

यह क्यों मायने रखता है

यह ताजा घटनाक्रम महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर वही पैटर्न दोहरा रहा है: रणनीतिक और उच्च-स्तरीय दबाव के जरिए पार्टी संरचनाओं को कमजोर करना। यदि सात सांसद वास्तव में अलग होते हैं, तो यह दिल्ली में उद्धव ठाकरे के प्रभाव और संसदीय दबाव बनाने की उनकी क्षमता के लिए एक बड़ा झटका होगा। मतदाताओं के लिए, यह अत्यधिक अस्थिरता का दौर है जहां पार्टी की निष्ठा और राजनीतिक व्यावहारिकता के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। यह गाथा याद दिलाती है कि मौजूदा माहौल में किसी पार्टी की ताकत केवल इस बात पर निर्भर करती है कि वह 'ऑपरेशन टाइगर' जैसी भीषण गर्मी में अपने कुनबे को कितना एकजुट रख पाती है।

द्वारा प्रिया नायर
राजनीतिक संवाददाता

प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।