ओडिशा की मतदाता सूची से 20 लाख नाम गायब: गंजाम और कटक पर क्यों टिकी हैं निगाहें?
ओडिशा में SIR के तहत नाम हटाने के मामले में गंजाम और कटक सबसे आगे

ओडिशा में मतदाता सूची को दुरुस्त करने के एक बड़े अभियान के तहत 20 लाख से अधिक नाम हटा दिए गए हैं, जिससे विभिन्न जिलों में इन विलोपनों के असमान वितरण पर सवाल उठ रहे हैं।
ओडिशा में विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया ने राज्य के चुनावी परिदृश्य में बड़ा बदलाव ला दिया है। भारत निर्वाचन आयोग द्वारा 6 जुलाई को जारी आंकड़ों के अनुसार, राज्य की ड्राफ्ट मतदाता सूची में 20.1 लाख नामों की कमी आई है—यह 6% की गिरावट है, जिसके बाद कुल मतदाताओं की संख्या 3.13 करोड़ रह गई है। हालांकि यह कटौती काफी बड़ी है, लेकिन विलोपनों में भौगोलिक असंगति ने odisha sir प्रक्रिया पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है।
विलोपन का भौगोलिक विश्लेषण
जिलेवार आंकड़ों से पता चलता है कि गंजाम और कटक में सबसे अधिक संख्या में नाम हटाए गए हैं, जहां क्रमशः 207,624 और 155,166 नाम सूची से बाहर किए गए हैं। मयूरभंज, जाजपुर और बलांगीर जैसे अन्य जिलों में भी भारी कटौती देखी गई है। दूसरी ओर, देवगढ़ और बौध जैसे जिलों में इसका असर सबसे कम रहा, जहां मतदाता सूची में कमी का आंकड़ा 20,000 से काफी नीचे है।
दिलचस्प बात यह है कि जब हम जिलों के प्रतिशत-आधारित आंकड़ों को देखते हैं, तो पैटर्न उम्मीदों से अलग नजर आता है। आमतौर पर माना जाता है कि शहरी केंद्रों में मतदाताओं की आवाजाही अधिक होती है, लेकिन सबसे अधिक प्रतिशत में मतदाता सूची में कमी उन जिलों में देखी गई है जहां शहरीकरण का स्तर बहुत अलग है। उदाहरण के लिए, मलकानगिरी में 10.2% की गिरावट देखी गई, जबकि वहां की 92% आबादी ग्रामीण है। इसी तरह, बलांगीर और कटक की जनसांख्यिकीय बनावट में काफी अंतर है, फिर भी दोनों ही उन क्षेत्रों की सूची में प्रमुखता से शामिल हैं जहां सबसे ज्यादा ड्राफ्ट मतदाता हटाए गए हैं।
यह क्यों महत्वपूर्ण है: आंकड़ों में विसंगति
SIR के गणना चरण को पूरा करने वाले अधिकांश बड़े राज्यों में एक स्पष्ट रुझान देखने को मिलता है: शहरी जिलों में जनसंख्या के पलायन और प्रवास के कारण आमतौर पर अधिक नाम हटाए जाते हैं। हालांकि, ओडिशा इस मामले में एक अपवाद है। यहां कोई स्पष्ट पैटर्न नहीं दिखता—ग्रामीण और शहरी दोनों ही जिलों में नाम हटने की दर असंगत है—जो यह दर्शाता है कि यह केवल प्रवास या शहरी विस्तार का परिणाम नहीं है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के लिए यह बड़े पैमाने पर की गई छंटनी महत्वपूर्ण है। ओडिशा जैसे राज्य में, जहां ऐतिहासिक रूप से कड़े चुनावी मुकाबले होते रहे हैं, मतदाता आधार में 6% की गिरावट भविष्य के चुनावी अभियानों के लिए गंभीर परिणाम ला सकती है। जैसे-जैसे राज्य अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन की ओर बढ़ रहा है, विभिन्न क्षेत्रों में इन आंकड़ों तक पहुंचने के तरीके में विसंगति राजनीतिक दलों और चुनाव विश्लेषकों के बीच बहस का मुद्दा बनी रहेगी।
आगे क्या होगा
odisha sir प्रक्रिया दो चरणों में पूरी होती है। गणना चरण पूरा होने के बाद—जिसमें फॉर्म वितरित करना और ड्राफ्ट सूची प्रकाशित करना शामिल था—ECI अब दूसरे चरण की ओर बढ़ रहा है। यह चरण अंतिम सूची को लॉक करने से पहले सुधार और सत्यापन का अवसर देता है। ड्राफ्ट सूची को लेकर मची हलचल के बीच, अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि अंतिम सूची प्रकाशित होने से पहले अधिकारी दावों और आपत्तियों का निपटारा कैसे करते हैं। मतदाताओं को सलाह दी जाती है कि वे 4 अगस्त की समय सीमा से पहले अपनी पंजीकरण स्थिति की जांच कर लें ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उनके नाम सूची में हैं।
प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।