एक शॉट के लिए 90 टेक: एसएस राजामौली की फिल्म 'वाराणसी' के पीछे का कठोर परफेक्शन
उस एक शॉट के लिए 90 टेक.. महेश बाबू की हालत खराब कर दी राजामौली ने!
पृथ्वीराज सुकुमारन ने भारत की अब तक की सबसे महत्वाकांक्षी फिल्म पर काम करने के दौरान की कड़ी मेहनत का खुलासा किया है।
एसएस राजामौली की आने वाली फिल्म वाराणसी का पैमाना चौंकाने वाला है—न केवल इसके ₹1200 करोड़ के बजट के कारण, बल्कि इसे जीवंत बनाने के लिए जिस हद तक परफेक्शन की जरूरत है, उसके कारण भी। प्रशंसक अगले साल 7 अप्रैल को होने वाली रिलीज का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, और सेट से आ रही खबरें बताती हैं कि यह एक ऐसी फिल्म है जहां समझौते की कोई जगह नहीं है। अभिनेता पृथ्वीराज सुकुमारन, जो महेश बाबू के 'रुद्र' किरदार के सामने विलेन 'कुंभा' की भूमिका निभा रहे हैं, के हालिया इंटरव्यू के अनुसार, फिल्म निर्माता की पूर्णता की भूख पहले से कहीं अधिक तेज है।
कलाकारों के लिए, यह प्रक्रिया सहनशक्ति की परीक्षा जैसी है। पृथ्वीराज, जो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बने हुए हैं, ने बताया कि निर्देशक अक्सर ऐसी सटीकता की मांग करते हैं जो अभिनेताओं को उनकी सीमाओं से परे धकेल देती है। एक उदाहरण में, टीम को बार-बार रीशूट करना पड़ा और एक ही सीक्वेंस के लिए 90 से 97 टेक लेने पड़े। यह केवल दोहराव नहीं है; यह एक ऐसे निर्देशक को दर्शाता है जो क्रू से पहले सेट पर आता है और आखिरी लाइट बंद होने के बाद ही जाता है।
राजामौली का तरीका
यह प्राथमिक स्रोत निर्देशक और उनके अभिनेताओं के बीच की दिलचस्प केमिस्ट्री को उजागर करता है। पृथ्वीराज स्वीकार करते हैं कि कई बार राजामौली का विजन—किसी विशेष फ्रेम के पीछे का 'क्यों'—उनके अपने अभिनय से कोसों दूर लगता था। ये केवल रिहर्सल नहीं थे; ये रचनात्मकता के बीच का संघर्ष था। लंच ब्रेक को केवल 20 मिनट तक सीमित रखने के साथ, सेट पर माहौल सैन्य अनुशासन जैसा रहता है।
मूल लेख के अनुसार, के.एल. नारायण और एस.एस. कार्तिकेय द्वारा 'श्री दुर्गा आर्ट्स' बैनर तले निर्मित इस फिल्म में प्रियंका चोपड़ा मुख्य भूमिका में हैं। एम.एम. कीरावनी के संगीत के साथ, यह प्रोजेक्ट एक ग्लोबल स्पेक्टेकल बनने की राह पर है। हालांकि, यह फिल्म की निर्माण प्रक्रिया ही है जो इसे सामान्य ब्लॉकबस्टर फिल्मों से अलग बनाती है। राजामौली को उनके साथी केवल एक निर्देशक के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे मंझे हुए कलाकार के रूप में देखते हैं जो हर उस हाव-भाव की बारीकी को समझते हैं जो वे अपने लीड एक्टर्स से करवाना चाहते हैं।
यह क्यों मायने रखता है
यही तीव्रता 'राजामौली ब्रांड' को परिभाषित करती है। एक ऐसे उद्योग में जहां अक्सर तेजी से काम पूरा करने पर जोर दिया जाता है, एक शॉट के लिए लगभग 100 टेक लेने का उनका आग्रह एक अधिक सटीक, लेखक-संचालित ब्लॉकबस्टर संस्कृति की ओर बदलाव का संकेत है। यह इस पारंपरिक सोच को चुनौती देता है कि बड़ी बजट की फिल्में केवल तकनीक और वीएफएक्स का उत्पाद हैं; इसके बजाय, यह बताता है कि मानवीय संघर्ष—निर्देशक और अभिनेता के बीच की घर्षण—ही सिनेमाई उत्कृष्टता का असली इंजन है। क्या पूर्णता की यह थका देने वाली खोज बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षित सफलता दिला पाएगी, यह भारतीय सिनेमा के इतिहास की इस सबसे महंगी फिल्म के लिए सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।