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ममता बनर्जी की पकड़ ढीली: सुष्मिता देव के इस्तीफे के बाद TMC में मची बड़ी बगावत

ममता बनर्जी को एक और बड़ा झटका, TMC सांसद सुष्मिता देव ने राज्यसभा से दिया इस्तीफा

द्वारा रोहन गुप्ताप्रकाशित 10 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
ममता बनर्जी की पकड़ ढीली: सुष्मिता देव के इस्तीफे के बाद TMC में मची बड़ी बगावत
ममता बनर्जी की पकड़ ढीली: सुष्मिता देव के इस्तीफे के बाद TMC में मची बड़ी बगावत

तृणमूल कांग्रेस एक अस्तित्व के संकट का सामना कर रही है। एक हफ्ते के भीतर दूसरे बड़े नेता के पार्टी छोड़ने से यह संकेत मिलता है कि बगावत अब संसद के दोनों सदनों तक फैल चुकी है।

पश्चिम बंगाल की राजनीतिक जमीन ममता बनर्जी के पैरों तले तेजी से खिसक रही है। बुधवार को तृणमूल कांग्रेस (TMC) को उस समय बड़ा झटका लगा जब सुष्मिता देव ने राज्यसभा से अपना इस्तीफा सौंप दिया। सभापति को भेजे गए औपचारिक पत्र के जरिए उनके इस्तीफे की पुष्टि हुई है। यह घटना दिग्गज नेता सुखेंदु शेखर रॉय के पार्टी छोड़ने के कुछ ही दिनों बाद हुई है, जिससे TMC नेतृत्व इस बढ़ते संकट को थामने के लिए संघर्ष कर रहा है, जो अब राज्य विधानसभा से निकलकर सीधे राष्ट्रीय राजधानी तक पहुंच गया है।

TMC सांसद सुष्मिता देव के लिए यह कदम लंबे समय से चल रही आंतरिक खींचतान का नतीजा माना जा रहा है। पार्टी छोड़ने के तुरंत बाद उन्हें असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के आवास पर देखा गया, जिससे इन अटकलों को बल मिला है कि वह जल्द ही TMC छोड़कर BJP में शामिल हो सकती हैं। सूत्रों का कहना है कि वह भगवा पार्टी के उम्मीदवार के रूप में उच्च सदन में वापसी की तैयारी कर रही हैं। यह कदम उन पूर्व कांग्रेस नेताओं की बदलती निष्ठा को दर्शाता है, जो राष्ट्रीय मंच की तलाश में TMC में शामिल हुए थे।

बगावत का राष्ट्रीय स्वरूप

इस इस्तीफे का समय पार्टी के लिए बेहद नुकसानदेह है। यह सुखेंदु शेखर रॉय के नाटकीय इस्तीफे के बाद हुआ है, जिन्होंने पार्टी छोड़ने से पहले तीखे शब्दों में इसे 'चोरों और बलात्कारियों' का अड्डा बताया था। उन्होंने RG कर अस्पताल विवाद के बाद पार्टी की छवि पर हुए असर को भी उजागर किया था। ये केवल अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि पार्टी के भीतर की संरचनात्मक खामियों का लक्षण हैं। जमीनी रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 20 लोकसभा सांसदों ने अब स्पीकर से अलग बैठने की मांग की है, जो प्रभावी रूप से उनके स्वतंत्र गुट के रूप में काम करने या NDA के साथ जुड़ने के इरादे को दर्शाता है।

यह विधायी विद्रोह पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी देखने को मिल रहा है, जहां कथित तौर पर 61 विधायकों ने बागी नेता का समर्थन करने के लिए पार्टी के आधिकारिक निर्देशों को दरकिनार कर दिया है। संदेश स्पष्ट है: TMC का केंद्रीय नेतृत्व अब पार्टी के भीतर अपने राजनीतिक भविष्य का एकमात्र निर्णायक नहीं रह गया है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

यह सिर्फ पाला बदलने का मामला नहीं है, बल्कि यह TMC के आंतरिक पदानुक्रम के पूरी तरह से ढहने का संकेत है। जब कोई पार्टी लगातार दो हफ्तों में अपने राष्ट्रीय प्रवक्ताओं और अनुभवी सांसदों को खोने लगे, तो यह संस्थागत नियंत्रण खोने का संकेत है। सुष्मिता देव ने जिस 'दो नावों' की दुविधा का जिक्र किया था—क्षेत्रीय आकांक्षाओं और राष्ट्रीय राजनीतिक वास्तविकताओं के बीच संतुलन न बना पाना—वह अब पार्टी के निराश कार्यकर्ताओं के बीच एक आम चर्चा बन गई है।

ममता बनर्जी के लिए चुनौती अब केवल चुनावी हार की नहीं है, बल्कि अपनी विधायी ताकत को पूरी तरह बिखरने से रोकने की है। यदि सांसदों के केंद्र सरकार के साथ जुड़ने का यह सिलसिला जारी रहता है, तो दिल्ली में TMC का प्रभाव अगले बड़े चुनावी चक्र से बहुत पहले ही खत्म हो सकता है, जिससे पार्टी अपने पुराने स्वरूप की एक खोखली छाया बनकर रह जाएगी।

द्वारा रोहन गुप्ता
बिज़नेस संवाददाता

रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।