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कानूनी खींचतान: मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार से अभियोजन निदेशक की नियुक्ति पर मांगा जवाब

आप अभियोजन निदेशक की नियुक्ति कैसे करना चाहते हैं? मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार से पूछा

द्वारा अनन्या अय्यरप्रकाशित 10 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
कानूनी खींचतान: मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार से अभियोजन निदेशक की नियुक्ति पर सवाल उठाए
कानूनी खींचतान: मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार से अभियोजन निदेशक की नियुक्ति पर सवाल उठाए

प्रशासनिक पारदर्शिता पर बढ़ती निगरानी के बीच अदालत ने शीर्ष कानूनी अधिकारियों की चयन प्रक्रिया पर स्पष्टता की मांग की है।

मद्रास हाईकोर्ट के गलियारों में फिलहाल एक जाना-पहचाना, लेकिन तीखा सवाल गूंज रहा है: राज्य सरकार आखिर अपने शीर्ष कानूनी अधिकारियों का चयन किस तरह करने वाली है? मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की प्रथम खंडपीठ ने तमिलनाडु सरकार को अभियोजन निदेशक, उप निदेशक और सहायक निदेशकों की नियुक्ति की प्रक्रिया को परिभाषित करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। यह निर्देश पांच लोक अभियोजकों द्वारा दायर उस कानूनी चुनौती के बाद आया है, जिसमें तर्क दिया गया है कि इन महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति की वर्तमान प्रक्रिया में व्यापक और पारदर्शी सुधार की आवश्यकता है।

BNSS प्रावधानों को चुनौती

मामले के केंद्र में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 20 को लेकर याचिकाकर्ताओं का तर्क है। पांच अभियोजकों—आइडन इसान, एम. संथिया, एस. शशिरेखा, जे.आर. हरक्यूलिस और एम. भरत रत्ना—का तर्क है कि यह प्रावधान संवैधानिक रूप से त्रुटिपूर्ण है, क्योंकि यह उन वकीलों को भी राज्य के अभियोजन पदानुक्रम में सीधे शीर्ष पदों पर आने की अनुमति देता है जिन्होंने कभी ट्रायल कोर्ट में काम नहीं किया है। तमिलनाडु लोक सेवा आयोग (TNPSC) के माध्यम से भर्ती हुए ये याचिकाकर्ता एक ऐसी योग्यता-आधारित पदोन्नति प्रणाली की मांग कर रहे हैं, जो कैडर में पहले से मौजूद लोगों को प्राथमिकता दे।

यह कानूनी लड़ाई न्यायिक स्वतंत्रता के संवेदनशील मुद्दे को भी छूती है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से आग्रह किया है कि वह यह अनिवार्य करे कि इन शीर्ष अभियोजन पदों पर की जाने वाली किसी भी नियुक्ति के लिए हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की सहमति आवश्यक हो, ताकि कानूनी मशीनरी में कार्यकारी हस्तक्षेप को रोका जा सके।

नेतृत्व में बदलाव

अदालत की कार्यवाही के दौरान निदेशालय के मौजूदा नेतृत्व को लेकर भी एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम देखने को मिला। अभियोजन निदेशक के रूप में जी. कृष्णराजा के अधिकार को चुनौती देने वाली एक अलग याचिका को पीठ ने बंद कर दिया। सरकार ने अदालत को सूचित किया कि उनकी सेवाएं पहले ही समाप्त की जा चुकी हैं, जिससे वह विशेष याचिका निष्प्रभावी हो गई है। अब जब यह पद चर्चा में है, तो सरकार का निर्देश लेने के लिए दो सप्ताह का समय मांगना यह संकेत देता है कि सरकार इन संवेदनशील नियुक्तियों के प्रति अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार कर रही है।

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है

यह मामला कोई अलग-थलग घटना नहीं है। यह ऐसे समय में आया है जब तमिलनाडु की न्यायिक प्रणाली भारी दबाव में है। सेंथिल बालाजी मामले के प्रबंधन पर सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणियों से लेकर हाई-प्रोफाइल हस्तियों पर मुकदमा चलाने और मंजूरी देने के तरीके को लेकर व्यापक चिंताओं तक, न्यायपालिका अपनी निगरानी की भूमिका को लगातार मजबूत कर रही है।

जब राज्य सरकार को 'दिशाहीन' मुकदमों या राजनीतिक रूप से प्रभावित नियुक्तियों के लिए आलोचना का सामना करना पड़ता है, तो इसका असर न्याय वितरण प्रणाली की नींव तक पहुंचता है। मद्रास हाईकोर्ट का अभियोजन निदेशालय के लिए एक पारदर्शी और संहिताबद्ध प्रक्रिया पर जोर देना इस बात का संकेत है कि अपारदर्शी प्रशासनिक नियुक्तियों के दौर का कड़ा विरोध हो रहा है। कानूनी बिरादरी के लिए, इस मामले का परिणाम यह तय करेगा कि अभियोजन शाखा एक करियर-आधारित सेवा बनी रहेगी या कार्यकारी विवेक के बदलते रुख के अधीन एक पद।

द्वारा अनन्या अय्यर
वैश्विक मामले संवाददाता

अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।