भारत का हरित ऊर्जा का सपना: जलवायु परिवर्तन की हकीकत से सामना
भारत की 90% नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं जलवायु जोखिम में हैं। जानिए इन्हें सुरक्षित कैसे बनाया जाए
एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि 2030 तक नियोजित नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में से 90 प्रतिशत को उच्च जलवायु जोखिम का सामना करना पड़ेगा, लेकिन समय रहते हस्तक्षेप से देश के ऊर्जा भविष्य को सुरक्षित किया जा सकता है।
भारत के भविष्य को रोशन करने के लिए लगाए जा रहे सोलर पैनल और विंड टर्बाइन फिलहाल एक बड़े खतरे के मुहाने पर हैं। ज्यूरिख ग्रुप की एक हालिया रिपोर्ट में दस राज्यों की 871 नवीकरणीय ऊर्जा साइटों का विश्लेषण किया गया है, जिसमें एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है: 267 GW की कुल क्षमता वाली 90 प्रतिशत नियोजित परियोजनाएं 2030 तक भौतिक जलवायु खतरों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं। इनमें से 66 प्रतिशत साइटों को 'क्रिटिकल' जोखिम श्रेणी में रखा गया है, जो यह दर्शाता है कि हरित ऊर्जा की ओर संक्रमण उस पर्यावरणीय अस्थिरता से अछूता नहीं है, जिसे कम करने के लिए इसे अपनाया जा रहा है।
सौर ऊर्जा परियोजनाएं, जो कुल क्षमता का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा हैं, विशेष रूप से जोखिम में हैं। ये खतरे केवल सैद्धांतिक नहीं हैं। ओलावृष्टि से कांच टूटने जैसी तत्काल क्षति से लेकर 'छिपे हुए' दोषों तक, जो वर्षों में ऊर्जा उत्पादन को कम कर देते हैं, इनका भौतिक प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। पवन ऊर्जा को तेज चक्रवातों और अनिश्चित मानसून से जूझना पड़ रहा है, जबकि जलविद्युत परियोजनाएं—भले ही संख्या में कम हों—वित्तीय रूप से सबसे अधिक जोखिम वाली हैं, क्योंकि ऐसे इलाकों में निर्माण की लागत बहुत अधिक है जहां ऐतिहासिक वर्षा के पैटर्न अब भविष्य के लिए भरोसेमंद नहीं रहे।
निष्क्रियता की कीमत बनाम मजबूती का खर्च
यह रिपोर्ट आगे बढ़ने का एक व्यावहारिक रास्ता सुझाती है। चूंकि इनमें से अधिकांश परियोजनाएं अभी योजना या निर्माण के चरण में हैं, इसलिए उन्हें मजबूत बनाने का अवसर अभी हमारे पास है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि परियोजना के कुल पूंजीगत व्यय (CAPEX) का मात्र 2 प्रतिशत हिस्सा यदि लक्षित निवेश के रूप में खर्च किया जाए, तो गंभीर नुकसान की संभावना को 75 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। यह केवल एक तकनीकी सुधार नहीं है; यह भारत के ऊर्जा संक्रमण को पटरी पर रखने और भविष्य में मरम्मत के भारी खर्चों से अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए एक वित्तीय अनिवार्यता है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है: व्यापक परिप्रेक्ष्य
यह स्थिति भारत की विकास गाथा में एक बार-बार उभरने वाले तनाव को उजागर करती है: क्षमता लक्ष्यों को हासिल करने की जल्दबाजी अक्सर दीर्घकालिक पर्यावरणीय तनाव परीक्षणों (stress testing) को पीछे छोड़ देती है। जहां दुनिया परमाणु ऊर्जा से लेकर ऑफशोर विंड तक विभिन्न ऊर्जा स्रोतों के अर्थशास्त्र पर बहस कर रही है, वहीं भारत के लिए मुख्य चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि आज हम जो बुनियादी ढांचा तैयार कर रहे हैं, वह 2025 और उसके बाद के 'न्यू नॉर्मल' का सामना कर सके। यदि नीति निर्माता और डेवलपर्स जलवायु जोखिम को एक अनिवार्य बाधा के बजाय बाद में सोचे जाने वाले विषय के रूप में देखते रहे, तो देश उन संपत्तियों में अरबों रुपये बर्बाद कर सकता है जो जरूरत के समय विफल हो सकती हैं।
स्वच्छ ग्रिड की ओर संक्रमण समय के खिलाफ एक दौड़ है, लेकिन यह भूगोल के खिलाफ भी एक लड़ाई है। भारत के लिए, खरीद और योजना के चरणों में ही मजबूती को शामिल करना एकमात्र तरीका है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि हमारी नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता देश के बढ़ते शहरों और उद्योगों के लिए एक स्थिर आधार बनी रहे। अभी कदम उठाकर, यह क्षेत्र एक उभरते हुए खतरे को एक लचीली और दीर्घकालिक संपत्ति में बदल सकता है।
प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।