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भारत ने तय किया एजेंडा: हिंद महासागर में स्थिरता के लिए नेतृत्व की कमान

भारत ने 28वीं IORA वरिष्ठ अधिकारियों की समिति की बैठक की अध्यक्षता की, हिंद महासागर क्षेत्र में शांतिपूर्ण सहयोग को मजबूती दी

द्वारा प्रिया नायरप्रकाशित 17 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
भारत ने तय किया एजेंडा: हिंद महासागर में स्थिरता के लिए नेतृत्व की कमान
भारत ने तय किया एजेंडा: हिंद महासागर में स्थिरता के लिए नेतृत्व की कमान

नई दिल्ली ने 28वीं IORA वरिष्ठ अधिकारियों की समिति की बैठक की अध्यक्षता संभाली है, जिसका मुख्य केंद्र क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा और साझा विकास है।

कूटनीतिक गलियारों में 28वीं IORA वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक को लेकर काफी हलचल है। हिंद महासागर क्षेत्र में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में, नई दिल्ली का इस निकाय की अध्यक्षता करना केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं है; यह विविध समुद्री हितों को एक साझा सहयोग ढांचे के तहत लाने का एक केंद्रित प्रयास है। समिति की मेजबानी करके, भारत केवल बयानबाजी से आगे बढ़कर एक ऐसे शांतिपूर्ण और स्थिर समुद्री क्षेत्र को बनाए रखने की व्यावहारिक कार्यप्रणाली पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, जो वैश्विक व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

एक रणनीतिक बदलाव

नई दिल्ली में अधिकारियों के लिए, इस बैठक का समय काफी महत्वपूर्ण है। हिंद महासागर अब केवल एक व्यापारिक मार्ग नहीं रह गया है; यह जटिल भू-राजनीतिक खींचतान का केंद्र बन चुका है। 28वीं IORA वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक की अध्यक्षता करके, भारत एक 'फर्स्ट रिस्पॉन्डर' और स्थिरता लाने वाली ताकत के रूप में कार्य करने के अपने इरादे को स्पष्ट कर रहा है। ध्यान साझा समुद्री सुरक्षा, आपदा जोखिम प्रबंधन और ब्लू इकोनॉमी पर है—ऐसे क्षेत्र जहां भारत ने वर्षों से अपनी घरेलू क्षमता का निर्माण किया है और अब वह उस विशेषज्ञता को अपने पड़ोसी देशों के साथ साझा करना चाहता है।

इन सत्रों से स्पष्ट संदेश यह है कि इन जलक्षेत्रों की सुरक्षा एक सामूहिक जिम्मेदारी है। हालांकि यह बैठक तकनीकी प्रकृति की है, जिसमें वरिष्ठ राजनयिक और नीति निर्माता शामिल हैं, लेकिन इसका उद्देश्य एक मजबूत, नियम-आधारित व्यवस्था बनाना है जो क्षेत्र को व्यापार के लिए खुला रखे और किसी भी एकतरफा आक्रामकता से मुक्त रखे।

बड़ी तस्वीर

यह मायने क्यों रखता है? भारत के लिए, IORA क्षेत्रीय विमर्श को प्रभावित करने का सबसे प्रभावी मंच है, जिस पर बड़े और अधिक विवादास्पद गुटों का बोझ नहीं है। इस समिति के केंद्र में खुद को स्थापित करके, नई दिल्ली प्रभावी रूप से अपने मुख्य प्रभाव क्षेत्र को बाहरी व्यवधानों से सुरक्षित कर रही है। यदि समिति अपने समुद्री सहयोग प्रोटोकॉल को सुव्यवस्थित करने में सफल हो जाती है, तो यह भारत को सुरक्षा और व्यापार मार्गों के प्रबंधन में एक 'फोर्स मल्टीप्लायर' (शक्ति गुणक) प्रदान करेगा, जिससे व्यक्तिगत द्विपक्षीय समझौतों से हटकर एक ठोस क्षेत्रीय सहमति की ओर बढ़ा जा सकेगा।

उच्च-स्तरीय समुद्री कूटनीति से परे, घरेलू नीति का मोर्चा भी उतनी ही मांग करता है। जहां केंद्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय है, वहीं राजस्थान जैसे राज्य अपनी बुनियादी ढांचा संबंधी चुनौतियों के कारण सुर्खियों में हैं। राज्य के जल भविष्य को सुरक्षित करने के उद्देश्य से 'किसाऊ बहुउद्देशीय परियोजना' पर सहयोग से लेकर जैसलमेर में अवैध बेसमेंट निर्माण के कारण एक ऐतिहासिक जैन ट्रस्ट संपत्ति के दुखद ढहने तक, अंतरराष्ट्रीय समिति की बैठकों की व्यवस्थित प्रकृति और स्थानीय शासन की अक्सर जटिल वास्तविकता के बीच एक स्पष्ट अंतर है। देश भर की ये घटनाएं दिखाती हैं कि सरकार कैसे एक तरफ वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही है, तो दूसरी तरफ घर पर बुनियादी ढांचे की तत्काल और अक्सर जर्जर होती चुनौतियों से जूझ रही है।

द्वारा प्रिया नायर
राजनीतिक संवाददाता

प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।