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रिक्शा की सवारी से '50 करोड़' के सौदे तक: शिवसेना के भीतर मची घमासान

50 हजार के लायक नहीं, रिक्शा की औकात नहीं और फिर गंदी गाली; सांसदों पर खूब भड़के संजय राउत

द्वारा कबीर शर्माप्रकाशित 17 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
रिक्शा की सवारी से '50 करोड़' के सौदे तक: शिवसेना के भीतर मची घमासान
रिक्शा की सवारी से '50 करोड़' के सौदे तक: शिवसेना के भीतर मची घमासान

पार्टी के भीतर बढ़ते विद्रोह के बीच, राज्यसभा सांसद संजय राउत ने अपने पूर्व सहयोगियों पर तीखा जुबानी हमला बोला है।

मुंबई के सत्ता के गलियारों में एक जानी-पहचानी, लेकिन अब और भी कड़वी हलचल मची है। लाइव हिंदुस्तान के लिए निसर्ग दीक्षित द्वारा लिखे गए एक मूल लेख के अनुसार, शिवसेना (UBT) के भीतर आंतरिक कलह अब चरम पर पहुंच गई है। राज्यसभा सांसद संजय राउत, जो अपनी बेबाक बयानी के लिए जाने जाते हैं, ने उन पार्टी नेताओं पर जमकर निशाना साधा है, जिन पर उन्होंने बेहतर भविष्य की तलाश में पार्टी छोड़ने का आरोप लगाया है।

विवाद की मुख्य वजह नांदेड़ के दो सांसदों का कथित तौर पर पाला बदलना है। राउत का दावा है कि इन नेताओं को चार्टर्ड फ्लाइट से ले जाया गया, जो उनकी व्यक्तिगत हैसियत से कहीं ऊपर था। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, "इनकी औकात रिक्शा में बैठने की भी नहीं थी," और सुझाव दिया कि इन नेताओं की जो भी अहमियत थी, वह केवल ठाकरे नाम के ब्रांड की वजह से थी।

वफादारी की 'बाजार कीमत'

यह बयानबाजी तब और अधिक तीखी हो गई जब राउत ने TMC नेता महुआ मोइत्रा के सोशल मीडिया पोस्ट पर प्रतिक्रिया दी। जहां मोइत्रा ने राजनीतिक दल-बदल की "सस्ती" दरों—4 करोड़ रुपये का एडवांस और मासिक वेतन—पर मजाक उड़ाया, वहीं राउत ने इससे कहीं अधिक और भड़काऊ अनुमान पेश किया। उन्होंने दावा किया कि बागी सांसद के लिए "न्यूनतम समर्थन मूल्य" (MSP) 50 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जिसमें 15 करोड़ रुपये अग्रिम (एडवांस) के रूप में दिए गए हैं।

राउत का इन नेताओं को "50,000 रुपये के भी लायक न बताना" पार्टी के भीतर गहरे असंतोष को दर्शाता है। यह केवल निष्ठा बदलने का मामला नहीं है; यह एक खुला वैचारिक युद्ध है जहां राजनीतिक पूंजी का मूल्य लगातार गिर रहा है। हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, उनका गुस्सा अपशब्दों के रूप में बाहर आया, जिस पर संजय निरुपम जैसे प्रतिद्वंद्वियों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।

यह क्यों मायने रखता है: पार्टी अनुशासन का पतन

हम यहां आधुनिक भारतीय राजनीति की एक गहरी समस्या का प्राथमिक स्रोत देख रहे हैं: वैचारिक आधार का पूरी तरह से खत्म होना। जब वरिष्ठ नेतृत्व अपशब्दों का सहारा लेता है और अपने ही सहयोगियों की व्यक्तिगत हैसियत पर सवाल उठाता है, तो यह राजनीतिक विमर्श से हटकर केवल अस्तित्व बचाने की लड़ाई का संकेत है।

एक पर्यवेक्षक के लिए, यह चलन चिंताजनक है। चाहे "15 करोड़ के एडवांस" के ये आरोप सही हों या केवल राजनीतिक बयानबाजी, ये उस पैटर्न को उजागर करते हैं जहां पार्टी के "ब्रांड" का व्यवसायीकरण हो रहा है। जैसे-जैसे यह अंतर्कलह जारी है, मतदाता यह सोचने पर मजबूर हैं कि क्या कोई राजनीतिक संस्था अपनी गरिमा बनाए रख सकती है, जब सदस्यों को जन-प्रतिनिधि के बजाय बेचने योग्य संपत्ति माना जाने लगे। यह संकट अब केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर भरोसे के पूरी तरह खत्म होने का है।

द्वारा कबीर शर्मा
फ़ीचर्स लेखक

कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।