न्यूजरूम से डायरेक्टर की कुर्सी तक: आधुनिक धारणाओं पर नीरू शर्मा की नजर
अनुभवी एंटरटेनमेंट जर्नलिस्ट नीरू शर्मा ने अपनी पहली शॉर्ट फिल्म 'बांद्रा बॉय' पेश की
बॉलीवुड की चकाचौंध और उसकी असलियत को दो दशकों तक करीब से देखने के बाद, एक अनुभवी पत्रकार ने अपनी पहली फिल्म के जरिए जनमत की नाजुक प्रकृति पर अपनी नजर डाली है।
बीते बीस सालों तक नीरू शर्मा पर्दे के उस पार रही हैं। आज तक और न्यूज24 के न्यूजरूम से लेकर E24 और सहारा इंडिया के दबाव भरे माहौल तक, उन्होंने अपना करियर दूसरों की जिंदगी को कवर करते हुए बिताया है। अब, इस अनुभवी एंटरटेनमेंट जर्नलिस्ट ने अपनी भूमिका बदल ली है और माइक छोड़कर निर्देशन की कमान संभालते हुए अपनी पहली शॉर्ट फिल्म, बांद्रा बॉय पेश की है।
यह प्रोजेक्ट इन दिनों काफी चर्चा में है, क्योंकि नीरू शर्मा बांद्रा बॉय न्यूज का दौर शुरू हो चुका है, जो एक पत्रकार के फिल्म निर्माता बनने के सफर को एक दुर्लभ उदाहरण के तौर पर पेश करता है। किसी डॉक्यूमेंट्री या जीवनी को चुनने के बजाय, शर्मा ने उस इंडस्ट्री को समझने के लिए थ्रिलर फॉर्मेट का सहारा लिया है, जिसे उन्होंने खुद सालों तक कवर किया था।
सच्चाई पर आधारित एक थ्रिलर
बांद्रा बॉय केवल एक रचनात्मक प्रयोग नहीं है; यह डिजिटल युग से किया गया एक सवाल है। शर्मा ने अपने व्यापक अनुभव का उपयोग करते हुए यह दिखाया है कि सोशल मीडिया के दौर में नैरेटिव कितनी तेजी से बनते हैं, जहां एक वायरल पोस्ट किसी सेलिब्रिटी की प्रतिष्ठा को बना या बिगाड़ सकती है।
एक थ्रिलर फिल्म बनाकर, शर्मा उन धारणाओं की परतों को हटाना चाहती हैं जो स्टार किड्स और सार्वजनिक हस्तियों को घेरे रहती हैं। उनका मानना है कि हम अपनी टाइमलाइन पर जिन 'स्वीकृत सच्चाइयों' को देखते हैं, वे अक्सर वास्तविकता के बजाय तेजी से फैलाई गई अटकलों का परिणाम होती हैं। यह इस बात पर एक कटाक्ष है कि कैसे हम, यानी दर्शक, स्टारडम के इस दिखावटी खेल में भागीदार बनते हैं।
यह क्यों मायने रखता है: पत्रकार से फिल्म निर्माता का सफर
पत्रकारिता से फिल्म निर्माण की ओर बढ़ना एक बड़ा करियर बदलाव है। जिस इंडस्ट्री में मीडिया और टैलेंट को अक्सर अलग-अलग खानों में रखा जाता है, वहां शर्मा जैसी शख्सियत एक ऐसी अंदरूनी समझ लेकर आती हैं, जो शायद ही कभी पर्दे पर दिखती है। जब कोई व्यक्ति, जिसने सालों तक बॉलीवुड की मशीनरी को करीब से देखा हो, अपनी खुद की फिल्म बनाता है, तो उसका परिणाम अक्सर अधिक व्यावहारिक और गहरा होता है।
यह बदलाव एक व्यापक ट्रेंड की ओर इशारा करता है, जहां जो लोग कभी 'क्या' और 'कौन' की रिपोर्टिंग करते थे, वे अब 'क्यों' की तलाश कर रहे हैं। सेलिब्रिटी गॉसिप से हटकर उस गॉसिप के सामाजिक प्रभाव पर ध्यान केंद्रित करके, शर्मा भारतीय मनोरंजन जगत के बारे में बातचीत के स्तर को ऊपर उठाने की कोशिश कर रही हैं। यह फिल्म अभी फेस्टिवल सर्किट में दिखाई जा रही है, जो यह परखने का काम कर रही है कि क्या दर्शक इंडस्ट्री को एक ऐसे आलोचक की नजर से देखने के लिए तैयार हैं, जिसे इंडस्ट्री की हर बारीकी और राज का पता है।
बड़ी तस्वीर
यह प्रोजेक्ट सिर्फ पेशे में बदलाव के कारण ही नहीं, बल्कि अपने विषय के कारण भी उल्लेखनीय है। हम एक ऐसी संस्कृति में जी रहे हैं जहां हेडलाइंस का बोलबाला है और बारीकियां अक्सर पीछे छूट जाती हैं। अपनी कहानी को बांद्रा में सेट करके—जो मुंबई के सेलिब्रिटी इकोसिस्टम का प्रतीक है—शर्मा ने सच और अफवाह की नजदीकी पर एक तीखी टिप्पणी की है। उनकी यह पहली फिल्म याद दिलाती है कि सेलिब्रिटीज के बारे में हम जो कहानियां गढ़ते हैं, वे सितारों से ज्यादा हमारे अपने सामाजिक पूर्वाग्रहों को उजागर करती हैं।
कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।