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काबुल के स्टूडियो से पेरिस के रैंप तक: गुलाली करीमी का विवादित सफर

इस चर्चित न्यूज़ एंकर के पहनावे पर पूरी दुनिया के अफगानी ख़फा हैं!

द्वारा अनन्या अय्यरप्रकाशित 26 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
काबुल के स्टूडियो से पेरिस के रैंप तक: गुलाली करीमी का विवादित सफर
काबुल के स्टूडियो से पेरिस के रैंप तक: गुलाली करीमी का विवादित सफर

अफगानिस्तान की एक पूर्व न्यूज़ एंकर का फ्रांस में मॉडलिंग की ओर रुख करना सांस्कृतिक अपेक्षाओं, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की निगरानी पर एक तीखी बहस का कारण बन गया है।

काबुल के गंभीर स्टूडियो से पेरिस की चकाचौंध भरी फैशन दुनिया तक का सफर शायद ही कभी आसान होता है, लेकिन पूर्व टीवी प्रेजेंटर गुलाली करीमी के लिए यह वैश्विक विवाद का केंद्र बन गया है। शमशाद टीवी और लेमार टीवी जैसे नेटवर्क का जाना-माना चेहरा रहीं करीमी का मॉडलिंग और मनोरंजन की दुनिया में कदम रखना अफगानी डायस्पोरा (प्रवासी समुदाय) के बीच तीव्र प्रतिक्रिया का कारण बना है। हाल ही में डॉयचे वेले दारी (Deutsche Welle Dari) के एक मूल लेख में दर्ज ऑनलाइन नफरत का यह मुख्य केंद्र, पारंपरिक अपेक्षाओं और व्यक्तिगत स्वायत्तता के दावे के बीच गहरे टकराव को उजागर करता है।

माइक्रोस्कोप के नीचे एक जिंदगी

पेरिस स्थित बेगम टीवी के साथ काम कर चुकीं करीमी के इंस्टाग्राम पर 2.8 लाख और टिकटॉक पर 2.3 लाख से अधिक फॉलोअर्स हैं। उनके आलोचकों के लिए, उनकी वर्तमान जीवनशैली—जो पश्चिमी फैशन और पेशेवर मॉडलिंग से चिह्नित है—उनके वतन की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का सीधा अपमान है। यह बहस अब जहरीली हो चुकी है, करीमी ने बताया है कि उन्हें फ्रांस में कुछ प्रवासियों द्वारा निशाना बनाया गया है, जिसके कारण सुरक्षा चिंताओं के चलते उन्हें कई बार अपना ठिकाना बदलना पड़ा है।

यह दबाव केवल सामाजिक नहीं, बल्कि गहरा राजनीतिक भी है। एक चौंकाने वाले खुलासे में करीमी ने बताया कि तालिबान के मुख्य प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने भी एक बार उनके पहनावे पर टिप्पणी करने की कोशिश की थी। पत्रकारिता के दौरान जब उन्होंने प्रवक्ता का इंटरव्यू लिया, तो उसके बाद उन्हें अनचाहे संदेश मिले, जिसमें उन्हें 'सलाह' दी गई कि एक पश्तून और मुस्लिम महिला को कैसा व्यवहार करना चाहिए। उनका जवाब स्पष्ट था: उन्होंने उसे ब्लॉक कर दिया और बहस में पड़ने के बजाय चुप्पी साधे रखना बेहतर समझा।

स्वायत्तता की कीमत

करीमी का कहना है, "मैं वही पहनती हूं जिसमें मुझे आत्मविश्वास और खुशी महसूस होती है।" उन्होंने इस विचार को खारिज कर दिया है कि अफगानी मूल की महिला होने के नाते उन्हें अपने पहनावे या करियर के रास्ते को तय करने के लिए किसी और की अनुमति चाहिए। उनका रुख स्पष्ट है: एक विशिष्ट, पारंपरिक जीवनशैली की मांग मानसिक उत्पीड़न का एक रूप है, जो महिलाओं को प्रतिगामी भूमिकाओं में कैद करना चाहती है, भले ही वे काबुल की बंदिशों से हजारों मील दूर हों।

यह क्यों मायने रखता है: बड़ी तस्वीर

यह विवाद अफगानी महिलाओं के लिए चल रहे एक बड़े संघर्ष का प्रतीक है। चूंकि देश महिलाओं के अधिकारों, शिक्षा और सार्वजनिक भागीदारी के पूर्ण पतन का सामना कर रहा है, ऐसे में सीमाओं के बाहर रहने वाली महिलाओं पर की जाने वाली यह निगरानी महिला पहचान पर नियंत्रण पाने का एक जरिया बन गई है। जब कोई समाज अपनी सीमाओं के भीतर रहने वालों की वास्तविकता को नियंत्रित नहीं कर पाता, तो वह अक्सर उन्हीं कठोर सामाजिक कोड को अपने प्रवासी समुदाय पर थोपने की कोशिश करता है। करीमी का अनुभव एक कठोर याद दिलाता है कि कई अफगानी महिलाओं के लिए 'परंपरावादी' नजरिया वैश्विक है, जो सीमाओं को पार कर व्यक्तिगत पसंद को राष्ट्रीय और धार्मिक अवज्ञा का मुद्दा बना देता है।

द्वारा अनन्या अय्यर
वैश्विक मामले संवाददाता

अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।