डर से सह-अस्तित्व तक: आंध्र प्रदेश की एक पहल कैसे सांपों के संरक्षण को नई परिभाषा दे रही है
आंध्र प्रदेश का 'Snake Speek' प्रोजेक्ट नेशनल जियोग्राफिक स्लिंगशॉट चैलेंज में शीर्ष 50 में शामिल
आंध्र प्रदेश के ग्रामीण इलाकों से शुरू हुए युवाओं के एक प्रोजेक्ट ने प्रतिष्ठित नेशनल जियोग्राफिक स्लिंगशॉट चैलेंज में दुनिया की शीर्ष 50 प्रविष्टियों में अपनी जगह बनाई है।
आंध्र प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में सांप को देखते ही लोगों में घबराहट और डर फैल जाना एक आम बात है। पीढ़ियों से चले आ रहे अंधविश्वासों के कारण अक्सर सांपों को मार दिया जाता है—भले ही वे जहरीले न हों—और लोग असुरक्षित तरीके से उन्हें पकड़ने की कोशिश करते हैं। लेकिन अब एक बड़ा बदलाव आ रहा है। वन्यजीव उत्साही संपत कांतिमाहंती के नेतृत्व में 'Snake Speek' प्रोजेक्ट इस डर को जानकारी और जागरूकता से बदलने का काम कर रहा है, और अब इस मिशन ने वैश्विक स्तर पर सबका ध्यान खींचा है।
इस पहल को हाल ही में 2026 नेशनल जियोग्राफिक स्लिंगशॉट चैलेंज में विशेष उल्लेख (honorable mention) मिला है। 104 देशों से आई 2,300 प्रविष्टियों में से इस प्रोजेक्ट को शीर्ष 50 में चुना गया, जो जमीनी स्तर पर किए जा रहे प्रयासों के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। नेशनल जियोग्राफिक सोसाइटी और 'Videos for Change' द्वारा आयोजित यह चैलेंज इस बात को रेखांकित करता है कि कैसे स्थानीय स्तर के कार्य वैश्विक पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौतियों का समाधान कर सकते हैं।
जमीनी स्तर पर काम
मूल रूप से, 'Snake Speek' प्रोजेक्ट एक जागरूकता अभियान है। यह सिर्फ सांपों के बारे में बात नहीं करता, बल्कि लोगों को उनके साथ सुरक्षित तरीके से रहने की कला सिखाता है। स्कूलों और सामुदायिक सत्रों के माध्यम से, यह टीम पूर्वी घाट (Eastern Ghats) के पास रहने वाले निवासियों, विशेषकर पालकोंडा और सीथमपेटा जैसे क्षेत्रों में, सांपों की पहचान, काटने पर प्राथमिक उपचार और सुरक्षा के तरीकों के बारे में शिक्षित करती है।
हालांकि यह प्रोजेक्ट अभी मिथकों को दूर करने पर केंद्रित है, लेकिन टीम के लक्ष्य बड़े हैं। उन्होंने ओडिशा सीमावर्ती क्षेत्रों और उत्तराखंड के सेलाकुई तक सांप के काटने के मामलों का व्यापक सर्वेक्षण करने का प्रस्ताव रखा था। हालांकि छोटे प्रस्तावों को बड़े पैमाने पर लागू करने की लॉजिस्टिक चुनौतियों के कारण इसके लिए फंडिंग नहीं मिल पाई, लेकिन टीम का हौसला कम नहीं हुआ है। अब वे DBS ग्लोबल यूनिवर्सिटी और डॉक्टरेट फेलो के अकादमिक सहयोग से रेस्क्यू ट्रेनिंग प्रोग्राम और रिसर्च-आधारित कार्यशालाएं शुरू करने की दिशा में काम कर रहे हैं।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
इस पहल की सफलता भारत के वन्यजीव संरक्षण के नजरिए में आए एक जरूरी बदलाव को दर्शाती है। लंबे समय तक, संरक्षण की नीतियां ऊपर से थोपी जाती रहीं, जिनमें ग्रामीण समुदायों की वास्तविकताओं को नजरअंदाज किया गया। केवल संरक्षण के बजाय 'सह-अस्तित्व' पर ध्यान केंद्रित करके, संपत की टीम एक सरल सत्य को स्वीकार कर रही है: यदि लोग वन्यजीवों को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानेंगे, तो आप उन्हें सुरक्षित नहीं रख सकते।
नेशनल जियोग्राफिक स्लिंगशॉट चैलेंज द्वारा मिली यह मान्यता साबित करती है कि सबसे प्रभावी संरक्षण मॉडल वे हैं जो स्थानीय संस्कृति से जुड़े होते हैं। जब समुदायों को वैज्ञानिक डेटा दिया जाता है—यह पता होता है कि कौन से सांप नुकसानदेह नहीं हैं और उनका सामना कैसे करना है—तो 'मानव-सांप संघर्ष' कम होने लगता है। अब ऐसे जमीनी समूहों के लिए चुनौती यह है कि वे अपने स्थानीय प्रभाव को बड़े पैमाने पर संस्थागत फंडिंग से कैसे जोड़ें ताकि इस गति को लंबे समय तक बनाए रखा जा सके।
आगे की राह
स्लिंगशॉट चैलेंज से मिली गति प्रोजेक्ट के अगले चरण के लिए एक उत्प्रेरक का काम करेगी। अपनी शैक्षिक कार्यशालाओं में वैज्ञानिक जिज्ञासा को शामिल करके, टीम ऐसे छात्रों की एक नई पीढ़ी तैयार करने की उम्मीद कर रही है जो पारिस्थितिकी तंत्र को खतरे के रूप में नहीं, बल्कि एक जटिल प्रणाली के रूप में देखें जिसे समझने की जरूरत है। जैसा कि संपत कहते हैं, लोगों के बदलते नजरिए में इसका सकारात्मक प्रभाव पहले से ही दिख रहा है। यह एक धीमी लेकिन व्यवस्थित प्रक्रिया है, जो आंध्र प्रदेश में ग्रामीण संरक्षण की तस्वीर को पूरी तरह बदल रही है।
कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।