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ऊर्जा की नई दिशा: रूस से कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता क्यों एक बड़ा दांव है

रूस से कच्चे तेल का आयात मई में बढ़ा

द्वारा कबीर शर्माप्रकाशित 14 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
ऊर्जा की नई दिशा: रूस से कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता क्यों एक बड़ा दांव है
ऊर्जा की नई दिशा: रूस से कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता क्यों एक बड़ा दांव है

जैसे-जैसे वैश्विक ऊर्जा बाजार बदल रहे हैं, रियायती रूसी ईंधन के लिए भारत की भूख एक नए स्तर पर पहुंच गई है, जो देश की रणनीतिक ऊर्जा कूटनीति को और जटिल बना रही है।

मई 2026 के आंकड़े भारत के बदलते ऊर्जा मानचित्र की स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं: देश ने रूसी जीवाश्म ईंधन के दुनिया के दूसरे सबसे बड़े खरीदार के रूप में अपनी स्थिति को मजबूती से स्थापित कर लिया है। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के आंकड़ों के अनुसार, हमारा कुल आयात अनुमानित 5.8 बिलियन यूरो (लगभग 6.7 बिलियन डॉलर) तक पहुंच गया है। हालांकि आजतक की सुर्खियां और हिंदुस्तान की रिपोर्ट व्यापार में उतार-चढ़ाव का संकेत देती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि रूसी कच्चा तेल भारत की वर्तमान रिफाइनिंग रणनीति की आधारशिला बना हुआ है।

आयात का विश्लेषण

यह केवल मात्रा की बात नहीं है; यह कच्चे तेल के प्रभुत्व की बात है। रूस से भारत के कुल आयात मूल्य का लगभग 83 प्रतिशत—जो 4.8 बिलियन यूरो है—कच्चे तेल पर खर्च हुआ। जब आप कोयले और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों को इसमें जोड़ते हैं, तो व्यापार का विशाल पैमाना स्पष्ट हो जाता है। जबकि होर्मुज जलडमरूमध्य के पास तनाव और विभिन्न भू-राजनीतिक दबावों ने वैश्विक बाजारों को हिला दिया है, भारतीय रिफाइनरियों ने अपने रिफाइनिंग मार्जिन को बढ़ाने और तैयार पेट्रोलियम उत्पादों के प्रमुख निर्यातक के रूप में अपनी भूमिका को मजबूत करने के लिए इस स्थिर और रियायती आपूर्ति का लाभ उठाया है।

वैश्विक बिसात

वैश्विक ऊर्जा प्रवाह का झुकाव काफी हद तक पूर्व की ओर हो गया है। वर्तमान में, चीन सबसे आगे है, जो रूस के कच्चे तेल के निर्यात का आधा हिस्सा ले रहा है, जबकि भारत 36 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर है। तुर्की और यूरोपीय संघ बाकी हिस्से पर कब्जा जमाए हुए हैं। यह बदलाव यूक्रेन में संघर्ष के बाद पश्चिमी ऊर्जा बाजारों से दूर होने के कारण आया है। भारतीय नीति निर्माताओं और उद्योग जगत के नेताओं के लिए, इस आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखने का निर्णय विचारधारा से ज्यादा कठोर आर्थिक व्यावहारिकता के बारे में है—ताकि वैश्विक मूल्य अस्थिरता के बावजूद ऊर्जा मुद्रास्फीति को नियंत्रित किया जा सके और अर्थव्यवस्था की रफ्तार बरकरार रहे।

यह क्यों मायने रखता है: बड़ी तस्वीर

रूसी ऊर्जा पर यह निर्भरता एक नाजुक संतुलन का खेल है। हालांकि रियायती कीमत घरेलू ईंधन लागत के लिए एक वरदान है, लेकिन 'राष्ट्रीय' विमर्श अक्सर 'व्यावसायिक' वास्तविकता से टकराता है। हम इस तनाव को प्रमुख दलों के दिल्ली मुख्यालयों में होने वाली प्रेस ब्रीफिंग में देखते हैं, जहां श्री गौरव भाटिया जैसे चेहरे या कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधि अक्सर ऊर्जा आयात बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा के दांव-पेच को संभालते नजर आते हैं।

यहां बड़ी तस्वीर भारत का एक निष्क्रिय ऊर्जा उपभोक्ता से एक सक्रिय, रणनीतिक खिलाड़ी के रूप में परिवर्तन है। हालांकि, संभावित अमेरिकी टैरिफ और अंतरराष्ट्रीय दबाव की चर्चाएं—जैसा कि विभिन्न मसाले (mshale) रिपोर्टों में उल्लेख किया गया है—यह संकेत देती हैं कि यह दौर हमेशा नहीं रह सकता। क्या भारत मास्को के साथ अपनी साझेदारी को गहरा करना जारी रखेगा या भविष्य के व्यापार दंड से बचने के लिए अपने स्रोतों में विविधता लाएगा, यह आने वाले महीनों में हमारी ऊर्जा सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा सवाल बना रहेगा।

द्वारा कबीर शर्मा
फ़ीचर्स लेखक

कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।