रूस से भारत का ऊर्जा आयात बढ़ा: मई में 6.7 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंचा कारोबार
भारत का रूस से कच्चे तेल और अन्य ईंधन का आयात मई में बढ़कर 6.7 अरब डॉलर के पार
भारत ने रूस से कच्चे तेल और अन्य ईंधन की खरीद में तेजी जारी रखी है, जिससे मई महीने में कुल आयात का आंकड़ा 6.7 अरब डॉलर के करीब पहुंच गया है।
दुनिया भर में भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भारत की रिफाइनिंग इकाइयां रियायती दरों का फायदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, मई में भारत रूस से जीवाश्म ईंधन का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बना रहा। यह डेटा न केवल भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को दर्शाता है, बल्कि वैश्विक तेल बाजार में हमारी रणनीतिक स्थिति को भी स्पष्ट करता है।
आयात का बढ़ता दायरा मई के दौरान भारत ने रूस से कुल 5.8 अरब यूरो (करीब 6.7 अरब डॉलर) का आयात किया। इस पूरी खेप में कच्चे तेल का दबदबा रहा, जिसकी हिस्सेदारी लगभग 83 प्रतिशत थी, जिसका मूल्य 4.8 अरब यूरो आंका गया। बाकी का हिस्सा तेल उत्पादों और कोयले से आया। दिलचस्प यह है कि भारत का कुल कच्चा तेल आयात मासिक आधार पर 8 प्रतिशत बढ़ा है, जिसमें रूस से आने वाले तेल की हिस्सेदारी में 21 प्रतिशत की बड़ी उछाल देखी गई है। यह एक ऐसा primary डेटा पॉइंट है जो बताता है कि भारतीय रिफाइनरियों के लिए रूसी तेल अभी भी सबसे आकर्षक विकल्प बना हुआ है।
रिफाइनरियों की बदलती रणनीति गुजरात के बड़े रिफाइनिंग हब इस खरीद में सबसे आगे रहे हैं। वाडिनार रिफाइनरी ने अप्रैल की तुलना में 36 प्रतिशत अधिक रूसी तेल का आयात किया, जबकि जामनगर रिफाइनरी में यह आंकड़ा 14 प्रतिशत रहा। एक समय जो सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां आयात रोकने के दबाव में थीं, वे भी अब मुख्यधारा में लौट आई हैं। न्यू मैंगलोर और विशाखापत्तनम रिफाइनरियों ने मार्च से दोबारा खरीद शुरू की और मई में इनमें क्रमश: 13 और 42 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। पारादीप रिफाइनरी में भी पिछले दो वर्षों का उच्चतम स्तर देखा गया है।
बड़ी तस्वीर: यह क्यों मायने रखता है?
यह original रुझान यह बताता है कि भारतीय कंपनियां वैश्विक प्रतिबंधों और व्यापारिक जटिलताओं के बीच अपनी ऊर्जा लागत को नियंत्रित करने के लिए कितनी फुर्ती से काम कर रही हैं। यह सिर्फ तेल खरीदने की बात नहीं है; यह भारत के रिफाइनिंग मार्जिन को सहारा देने और पेट्रोलियम उत्पादों के वैश्विक निर्यात में खुद को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने की एक सोची-समझी रणनीति है। जब तक रूसी तेल रियायती दरों पर उपलब्ध है, भारतीय कंपनियां इसे अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक अहम पिलर के रूप में देखती रहेंगी। इस article के निष्कर्ष से साफ है कि भारत वैश्विक ऊर्जा बाजार के 'न्यू नॉर्मल' को सफलतापूर्वक अपना चुका है।
चीन अभी भी 50 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ रूस का सबसे बड़ा खरीदार है, जबकि भारत 36 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर मजबूती से टिका है। तुर्किये और यूरोपीय संघ काफी पीछे हैं, जो यह साबित करता है कि भारत का ऊर्जा कूटनीति का रुख अब पूरी तरह से बाजार की जरूरतों पर केंद्रित है।
रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।