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कुत्ते, वफादारी और बंटी हुई पार्टी: महाराष्ट्र में शब्दों का कड़वा युद्ध

'कुछ कुत्ते, लेकिन वफादार नहीं': शिवसेना गुटों में संघर्ष; संजय राउत का तीखा हमला

द्वारा प्रिया नायरप्रकाशित 21 जून 2026· 3 मिनट पढ़ें
कुत्ते, वफादारी और बंटी हुई पार्टी: महाराष्ट्र में शब्दों का कड़वा युद्ध
कुत्ते, वफादारी और बंटी हुई पार्टी: महाराष्ट्र में शब्दों का कड़वा युद्ध

शिंदे गुट पर संजय राउत का ताजा सोशल मीडिया कटाक्ष शिवसेना के दोनों गुटों के बीच गहरे होते आंतरिक संकट को दर्शाता है।

शिवसेना की असली विरासत को लेकर छिड़ी जंग अब अपमानजनक बयानों के स्तर पर उतर आई है, जिसमें 'सड़क के कुत्ते' और 'जंगल के शिकारी' जैसे रूपकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने सोशल मीडिया पर एक तीखी पोस्ट के साथ इस विवाद को और हवा दे दी: "कुछ लोग कुत्ते होते हैं, लेकिन वे वफादार नहीं होते।" यह बयान महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे द्वारा पार्टी की 60वीं वर्षगांठ पर अपने 2022 के विद्रोह को 'जनता का जनादेश' बताने के कुछ दिनों बाद आया है।

यूबीटी गुट में और टूट की अफवाहों के बीच यह बयानबाजी चरम पर पहुंच गई है। ऐसी खबरें हैं कि शिवसेना (यूबीटी) के छह लोकसभा सांसद शिंदे गुट में शामिल हो सकते हैं, जिससे पार्टी नेतृत्व में खलबली मच गई है। राउत ने पुष्टि की है कि संसदीय दल की एक महत्वपूर्ण बैठक से अनुपस्थित रहने के लिए इन छह सदस्यों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है, जो संकेत देता है कि यूबीटी खेमा अयोग्यता की कार्यवाही शुरू करने की तैयारी कर रहा है।

वैचारिक गतिरोध

एकनाथ शिंदे के लिए, उनका रुख अब भी मजबूती और चुनौती भरा है। बढ़ते दबाव का जवाब देते हुए, मुख्यमंत्री ने अपने आलोचकों को करारा जवाब दिया और अपने कार्यों की तुलना पूर्व सहयोगियों से की। शिंदे ने पलटवार करते हुए कहा, "यह शेर आपके सामने है। कुत्ते झुंड में भौंकते हैं, लेकिन शेर अकेला चलता है।" उनका यह दावा कि जनता ने चार साल पहले लिए गए फैसले का समर्थन किया है, उद्धव ठाकरे खेमे द्वारा लगाए गए कानूनी और नैतिक आरोपों के खिलाफ उनका मुख्य बचाव है।

यह खींचतान सिर्फ राजनीतिक नाटक नहीं है; यह शिवसेना की पहचान के लिए एक कानूनी और ढांचागत संघर्ष है। राउत का मानना है कि यदि लोकसभा अध्यक्ष संवैधानिक मानदंडों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हैं, तो 'बागी' सांसदों की अयोग्यता अनिवार्य है। हालांकि, कानूनी रास्ता जटिलताओं से भरा है, जिसने शुरुआती विभाजन के बाद से ही राज्य की राजनीति को अस्थिर बना रखा है।

यह क्यों मायने रखता है: बड़ी तस्वीर

यह तनाव उस पार्टी का लक्षण है जो न केवल विभाजित हो रही है, बल्कि अंदर से खोखली भी हो रही है। वफादारी पर ध्यान केंद्रित करके, दोनों गुट अगले चुनावी चक्र से पहले 'असली' शिवसेना होने का दावा पेश कर रहे हैं। जब नेता वफादारी और अकेलेपन को लेकर एक-दूसरे पर निशाना साधते हैं, तो वे अपने जमीनी कार्यकर्ताओं को यह संदेश दे रहे होते हैं कि दोनों खेमों के बीच के संबंध न केवल खत्म हो चुके हैं, बल्कि अब उनके बीच गहरा तिरस्कार है।

यूबीटी खेमे के लिए तत्काल खतरा उनके संसदीय प्रभाव के कम होने का है। यदि छह सांसदों के पाला बदलने की अफवाह सच होती है, तो यह उनकी सौदेबाजी की शक्ति और मनोबल को काफी कमजोर कर देगा। इसके विपरीत, शिंदे गुट के लिए एक एकजुट और जनादेश प्राप्त शक्ति की छवि बनाए रखना जरूरी है ताकि वे 'दलबदलू' का ठप्पा हटा सकें। जैसे-जैसे दोनों पक्ष अपनी स्थिति मजबूत कर रहे हैं, ध्यान नीतियों से हटकर अस्तित्व और विरासत की कच्ची राजनीति पर केंद्रित हो गया है।

नोट: यह रिपोर्ट कन्नड़ प्रभा सहित क्षेत्रीय स्रोतों द्वारा शिवसेना के गुटीय घटनाक्रम पर दी गई जानकारी का संकलन है।

द्वारा प्रिया नायर
राजनीतिक संवाददाता

प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।