पार्टी में बढ़ती बगावत: TMC के भीतर गहराता आंतरिक संकट
80 TMC विधायक जीते थे पर ममता बनर्जी के पास बचेंगे बस 15, फिरहाद हाकिम भी जा सकते हैं
दिल्ली में हाई-प्रोफाइल बैठकों के बीच, TMC के भीतर बढ़ती दरारें पश्चिम बंगाल में पार्टी की विधायी पकड़ में बड़े बदलाव का संकेत दे रही हैं।
दिल्ली के सत्ता के गलियारे अक्सर ऐसी बैठकों के गवाह बनते हैं जो देश भर में अटकलों को हवा देती हैं, लेकिन ममता बनर्जी और सोनिया गांधी के बीच हालिया मुलाकात ने कोलकाता में एक असामान्य हलचल पैदा कर दी है। हालांकि दोनों खेमों की ओर से किसी भी संभावित विलय को लेकर आधिकारिक तौर पर इनकार किया जा रहा है, लेकिन अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के लिए जमीनी हकीकत लगातार अस्थिर होती दिख रही है।
संख्याओं का खेल
पर्दे के पीछे, बागी गुट द्वारा राज्य विधानसभा का गणित फिर से लिखा जा रहा है। इस बागी समूह की एक प्रमुख आवाज, रिताब्रता बनर्जी का दावा है कि उनकी संख्या बढ़कर 64 हो गई है और जल्द ही इसके 65 तक पहुंचने की उम्मीद है। उनका दावा काफी बड़ा है: उनका तर्क है कि उनका गुट ही 'असली' TMC का प्रतिनिधित्व करता है। उनका कहना है कि वे पार्टी के मौजूदा बैनर तले ही काम करना जारी रखेंगे, लेकिन खुद को मौजूदा नेतृत्व की दिशा से अलग कर लेंगे।
यह अस्थिरता साफ देखी जा सकती है। सूत्रों का कहना है कि विद्रोह अब केवल निचले स्तर के नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्टी के मुख्य आधार को निशाना बना रहा है। यहां तक कि पूर्व मेयर और वरिष्ठ नेता फिरहाद हाकिम जैसे दिग्गजों के भी पार्टी छोड़ने की चर्चाएं तेज हैं। यदि ये रिपोर्ट सच साबित होती हैं, तो पार्टी की विधायी ताकत में ऐतिहासिक गिरावट आ सकती है, जिससे नेतृत्व के पास उसके मूल 80 सीटों के जनादेश का केवल एक छोटा हिस्सा ही बचेगा।
खंडन और कूटनीतिक चुप्पी
इन चर्चाओं पर आधिकारिक प्रतिक्रिया बहुत संक्षिप्त और सख्त रही है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने विलय की बातों को बेबुनियाद बताते हुए दिल्ली की बैठक को राजनीतिक एकीकरण के बजाय व्यक्तिगत मामलों पर चर्चा करार दिया है। इसी तरह, TMC के अंदरूनी सूत्रों ने भी इन खबरों को निराधार बताते हुए कहा है कि उन्हें ऐसी किसी आंतरिक हलचल की कोई जानकारी नहीं है।
फिर भी, इस अशांति का समय नजरअंदाज करने लायक नहीं है। चाहे बनर्जी और गांधी के बीच की बैठक व्यापक विपक्षी एकता के बारे में रही हो—जैसा कि कुछ सूत्रों का सुझाव है—या कुछ और, इस घटनाक्रम ने राज्य इकाई के भीतर पहले से नाराज लोगों का हौसला बढ़ा दिया है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
यह आंतरिक उथल-पुथल पार्टी के संगठनात्मक ढांचे के लिए एक गंभीर 'स्ट्रेस टेस्ट' है। जब ममता बनर्जी जैसी कद-काठी की नेता को लगभग 65 विधायकों के संभावित पलायन का सामना करना पड़ता है, तो यह केवल मतभेदों से कहीं अधिक है; यह उस संरक्षण और वैचारिक एकजुटता के टूटने का संकेत है जिसने कभी पार्टी को परिभाषित किया था। यदि बागी गुट अपनी स्थिति पर कायम रहता है, तो यह न केवल पार्टी के विधायी नियंत्रण को कमजोर करेगा, बल्कि पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य को भी पूरी तरह बदल देगा। यह अगले चुनावी चक्र से बहुत पहले राज्य में सत्ता के पुनर्गठन को मजबूर कर सकता है। निसर्ग दीक्षित द्वारा विश्लेषित हालिया स्रोत सामग्री पर आधारित यह एक मूल रिपोर्ट है, और स्थिति अभी भी अस्थिर बनी हुई है, जिसमें आने वाले हफ्तों में और भी चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं।
कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।