डिजिटल फुटप्रिंट्स और डमी सिमुलेशन: लोहागढ़ किला हत्याकांड की जांच के अंदर की कहानी
न्यूज अलर्ट: लोहागढ़ किला हत्याकांड के सीन को रीक्रिएट कर रही पुलिस, डिजिटल सबूतों की हो रही गहन जांच

पुणे ग्रामीण पुलिस चेतन अग्रवाल की जिंदगी के आखिरी पलों की कड़ियों को जोड़ रही है। ऐतिहासिक स्थल पर हुए इस कथित हादसे की थ्योरी को गलत साबित करने के लिए फॉरेंसिक रीकंस्ट्रक्शन का सहारा लिया जा रहा है।
लोहागढ़ किले का ऊबड़-खाबड़ और हवादार इलाका, जो आमतौर पर ट्रेकर्स और इतिहास प्रेमियों को आकर्षित करता है, इस हफ्ते पुणे ग्रामीण पुलिस की जांच का केंद्र बन गया। लोहागढ़ किला हत्याकांड के मामले में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, जांचकर्ताओं ने उन घटनाओं के क्रम को बारीकी से दोहराया, जिसके कारण चेतन अग्रवाल की मौत हुई। घटनास्थल पर आरोपियों, सिया और चेतन, की मौजूदगी में इस कवायद का उद्देश्य उनके बयानों और पहाड़ी की वास्तविक स्थिति के बीच के अंतर को समझना था।
कई घंटों तक चले इस ऑपरेशन के दौरान, टीम ने पीड़ित के कद-काठी के बराबर वजन वाली एक डमी का इस्तेमाल किया। इसका मकसद साफ था: यह पता लगाना कि क्या यह वाकई एक हादसा था या सोची-समझी हिंसा। आरोपियों द्वारा अपनाए गए रास्तों को दोबारा तय करके और हर मूवमेंट को दर्ज करके, पुलिस यह साबित करने की कोशिश कर रही है कि क्या इस घटना को अंजाम दिया गया था। हर गतिविधि की फॉरेंसिक मैपिंग की गई, और वरिष्ठ अधिकारी खुद वहां मौजूद रहे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह रीकंस्ट्रक्शन अदालत की कड़ी जांच में खरा उतरे।
डिजिटल सबूतों की पड़ताल
जमीन पर जहां सीन को रीक्रिएट किया जा रहा था, वहीं जांच का रुख डिजिटल दुनिया की ओर भी मुड़ गया। सूत्रों के मुताबिक, जांचकर्ता आरोपियों से जुड़ी इंटरनेट सर्च हिस्ट्री को खंगाल रहे हैं। शक है कि अपराध की योजना बनाने के दौरान ऑनलाइन सर्च के जरिए शारीरिक नुकसान पहुंचाने के तरीकों और अपराध को छिपाने के उपायों को खोजा गया था। हालांकि जांच जारी होने के कारण अधिकारी तकनीकी जानकारी साझा नहीं कर रहे हैं, लेकिन यह डिजिटल सबूत अभियोजन पक्ष के तर्क का मुख्य आधार बनने की उम्मीद है।
भौतिक सबूतों—गिरने की लॉजिस्टिक्स—और डिजिटल फुटप्रिंट का मेल यह संकेत देता है कि यह एक सोची-समझी साजिश थी, न कि कोई अचानक हुई घटना। जैसे-जैसे पुलिस इन निष्कर्षों को इकट्ठा कर रही है, पूरा ध्यान इस बात पर है कि क्या आरोपियों ने इसे किले की ऊंचाई से गिरने वाले एक हादसे का रूप देने की कोशिश की थी।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है
यह केस इस बात की याद दिलाता है कि आधुनिक आपराधिक जांच कितनी बदल गई है। पहले, ऐसी घटनाएं पूरी तरह से गवाहों या घटनास्थल पर मौजूद परिस्थितियों पर निर्भर होती थीं। आज, 'डिजिटल ट्रेल' अक्सर वह मूक गवाह होता है जो किसी भी झूठी दलील को तोड़ देता है। सीन रीकंस्ट्रक्शन में आरोपियों को शामिल करके, पुलिस भौतिक विज्ञान के नियमों और उनकी ऑनलाइन हिस्ट्री के अटूट सबूतों के आधार पर उनके बयानों की सच्चाई परख रही है।
बड़ी बात यह है कि हाई-प्रोफाइल मामलों में 'आकस्मिक मौत' के दावों को चुनौती देने के लिए फॉरेंसिक तकनीक पर निर्भरता बढ़ रही है। जैसे-जैसे कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, अभियोजन पक्ष की मजबूती इस बात पर निर्भर करेगी कि यह डिजिटल डेटा किले में किए गए भौतिक रीकंस्ट्रक्शन से कितना मेल खाता है। फिलहाल, यह एक सक्रिय और विकसित होती जांच है, जिसके निष्कर्षों को सबूतों की श्रृंखला पूरी होने के बाद अदालत में पेश किया जाएगा।
रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।