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क्लासरूम और कैंपेन: केरल में PM-SHRI पर छिड़ी बहस का क्या है कारण?

केरल में PM-SHRI योजना पर सरकार के रुख को लेकर क्यों मचा है घमासान? | जानिए पूरी बात

द्वारा कबीर शर्माप्रकाशित 19 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
क्लासरूम और कैंपेन: केरल में PM-SHRI पर छिड़ी बहस का क्या है कारण?
क्लासरूम और कैंपेन: केरल में PM-SHRI पर छिड़ी बहस का क्या है कारण?

केंद्र सरकार की एक शिक्षा पहल केरल में राजनीतिक खींचतान का नया केंद्र बन गई है, जहां एक तरफ वैचारिक प्रतिबद्धता है तो दूसरी तरफ राज्य की स्कूली प्रणाली की व्यावहारिक जरूरतें।

तिरुवनंतपुरम में प्रशासनिक कामकाज की हलचल के बीच, 'प्रधानमंत्री स्कूल्स फॉर राइजिंग इंडिया' (PM-SHRI) योजना को लेकर राजनीतिक दलों के बीच तीखी बहस छिड़ी हुई है। हालांकि यह परियोजना मुख्य रूप से मौजूदा स्कूलों के बुनियादी ढांचे को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के मानकों के अनुरूप अपग्रेड करने के बारे में है, लेकिन केरल में यह राजनीतिक दांव-पेच का अखाड़ा बन गई है। UDF के नेतृत्व वाली राज्य सरकार अब एक तरफ केंद्रीय फंड के आकर्षण और दूसरी तरफ विपक्ष की कड़ी निगरानी के बीच फंस गई है, जो इसे शासन में 'यू-टर्न' करार दे रहे हैं।

इस भ्रम के मूल में रुख में आया बदलाव है। राज्य के शिक्षा मंत्री द्वारा यह संकेत दिए जाने के बाद कि सरकार कुछ शर्तों के साथ इस योजना को आगे बढ़ाएगी, इस विवाद ने फिर से जोर पकड़ लिया है। विपक्षी LDF लगातार हमलावर है और मौजूदा प्रशासन पर 'दोहरे मापदंड' अपनाने और 'कांग्रेस-बीजेपी के बीच मिलीभगत' का आरोप लगा रही है। वे स्थिति के विरोधाभास की ओर इशारा करते हैं: तीखी वैचारिक बयानबाजी के बावजूद, पिछली LDF सरकार ने वास्तव में एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे और केंद्र से 93 करोड़ रुपये की धनराशि प्राप्त की थी।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

यह मामला सिर्फ पेंट, स्मार्ट बोर्ड या प्रयोगशाला के उपकरणों तक सीमित नहीं है। आम नागरिक के लिए, PM-SHRI पर चल रही बहस भारतीय संघवाद की 'वैचारिक कलाबाजी' को समझने का एक जरिया है। जब केंद्र सरकार ऐसी कोई योजना लाती है जिसमें राज्यों की सहमति जरूरी होती है, तो अक्सर यह घर्षण का बिंदु बन जाता है, जहां क्षेत्रीय पहचान केंद्रीय आदेशों से टकराती है। केरल में, जहां राजनीतिक विमर्श केंद्रीय हस्तक्षेप को लेकर बेहद सतर्क रहता है, वहां दिल्ली की किसी भी पहल को स्वीकार करना राज्य की स्वायत्तता के लिए एक लिटमस टेस्ट बन जाता है। मौजूदा अनिश्चितता—जहां मुख्यमंत्री परामर्श और वित्तीय सहयोग की आवश्यकता के बीच संतुलन बना रहे हैं—यह दर्शाती है कि राज्यों को अपनी मूल राजनीतिक पहचान से समझौता किए बिना राष्ट्रीय संसाधनों तक पहुंचने के लिए कितनी कठिन रस्सी पर चलना पड़ता है।

इस जटिलता को विभिन्न हितधारकों की भागीदारी ने और बढ़ा दिया है, जिसमें 'समस्ता' जैसे धार्मिक संगठन भी शामिल हैं, जिन्होंने राज्य के नेतृत्व की ओर से स्पष्ट और दृढ़ रुख न होने की सार्वजनिक रूप से आलोचना की है। राजनीतिक दृष्टिकोण भी धुंधला है; जहां कुछ केंद्रीय मंत्रियों ने इस कदम का बच्चों के लिए वरदान के रूप में स्वागत किया है, वहीं स्थानीय राजनीतिक माहौल ध्रुवीकृत बना हुआ है। राज्य के नेतृत्व और प्रधानमंत्री के बीच होने वाली आगामी उच्च-स्तरीय बैठक में, GST जैसे अन्य वित्तीय मुद्दों के साथ-साथ PM-SHRI का मुद्दा भी चर्चा का मुख्य केंद्र रहने की संभावना है।

अंततः, यह स्कूली योजना एक छद्म युद्ध (प्रॉक्सी वॉर) बन गई है। राज्य इसे पूरी तरह लागू करने का फैसला करे या बीच का कोई रास्ता निकाले, यह घटना याद दिलाती है कि भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में शिक्षा कभी भी केवल पाठ्यक्रम या शिक्षण पद्धति के बारे में नहीं होती—यह राजनीतिक वैधता का एक बुनियादी आधार है। उन छात्रों और शिक्षकों के लिए जो इन वादे किए गए सुधारों का इंतजार कर रहे हैं, इस गाथा का 'सही अर्थ' अभी भी दावों और प्रतिदावों की परतों के नीचे दबा हुआ है।

द्वारा कबीर शर्मा
फ़ीचर्स लेखक

कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।