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रेलवे का 'बुलडोजर' एक्शन: बंगाल में अतिक्रमण हटाओ अभियान तेज

टिकियापाड़ा में रेलवे की जमीन पर चला बुलडोजर, 'अवैध' झोपड़ियों और दुकानों को किया गया ध्वस्त

द्वारा अर्जुन मेहताप्रकाशित 23 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
रेलवे का अतिक्रमण हटाओ अभियान: बंगाल में बुलडोजर कार्रवाई
रेलवे का अतिक्रमण हटाओ अभियान: बंगाल में बुलडोजर कार्रवाई

टिकियापाड़ा से लेकर हाबरा तक, भारतीय रेलवे अपनी जमीन को वापस पाने और स्टेशनों के आसपास के दायरे को खाली कराने के लिए एक बड़े और समन्वित अभियान को अंजाम दे रहा है।

मंगलवार को टिकियापाड़ा में सुबह-सुबह रेल की गड़गड़ाहट की जगह भारी मशीनों के शोर ने ले ली। रेलवे सुरक्षा बल (RPF) और भारी पुलिस बल की मौजूदगी में चलाए गए इस हाई-प्रोफाइल ऑपरेशन में, बुलडोजरों ने पटरियों के किनारे बनी करीब 100 अस्थायी झोपड़ियों और दुकानों को ढहा दिया। यह कोई इकलौती घटना नहीं है; यह हाबरा, दमदम, कृष्णानगर और अन्य स्टेशनों पर चल रहे आक्रामक 'अतिक्रमण हटाओ' अभियानों की एक कड़ी है, जिसके जरिए अधिकारी राज्य भर में रेलवे की जमीन खाली कराने में जुटे हैं।

विस्थापन का पैटर्न

यात्रियों के लिए यह बदलाव साफ नजर आ रहा है। हाबरा जैसे इलाकों में, जहां स्टेशन परिसर अवैध स्टालों और झोपड़ियों से बुरी तरह घिरे थे—यहां तक कि कुछ जगहों पर राजनीतिक कार्यालय भी बने थे—वहां रातों-रात हुई कार्रवाई से बरसों से कब्जा की गई जगह खाली हो गई है। रेलवे अधिकारियों का कहना है कि ये ढाँचे न केवल अवैध थे, बल्कि पटरियों के किनारे बनी बड़ी जल निकासी प्रणालियों की सफाई जैसे जरूरी रखरखाव कार्यों में भी बाधा डाल रहे थे। विशेष रूप से टिकियापाड़ा में, नालियों पर कचरा जमा होने को जलभराव का मुख्य कारण माना गया, जिससे मानसून के दौरान अक्सर ट्रेन सेवाएं बाधित होती थीं।

मानवीय पहलू

हालांकि प्रशासन का दावा है कि ध्वस्तीकरण से काफी पहले सभी कब्जाधारियों को स्पष्ट नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन जमीनी हकीकत तनावपूर्ण बनी हुई है। दमदम में, बेदखली के डर से एक स्थानीय फेरीवाले द्वारा आत्महत्या के प्रयास की खबर सामने आई, जो उन लोगों की हताशा को दर्शाता है जिनकी आजीविका इन स्टेशनों के किनारे से जुड़ी है। CPI(M) और CITU समेत कई राजनीतिक कार्यकर्ता इस अभियान का कड़ा विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि विस्थापित परिवारों के लिए किसी भी ठोस पुनर्वास योजना के बिना ये कार्रवाई की जा रही है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है: बड़ी तस्वीर

जमीन खाली कराने का यह अभियान स्टेशन के बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने और यात्रियों की सुरक्षा में सुधार लाने की व्यापक राष्ट्रीय नीति का हिस्सा है। व्यस्त टर्मिनलों के आसपास 'चोक पॉइंट्स' को साफ करके—जैसा कि eisamay और 24ghantabanglanews की रिपोर्टों में भी देखा गया है—रेलवे परिचालन दक्षता और यात्रियों की आवाजाही को प्राथमिकता दे रहा है। हालांकि, 'नोटिस-विरोध-बुलडोजर' का यह चक्र एक अनसुलझे प्रणालीगत तनाव को उजागर करता है: सार्वजनिक भूमि को वापस पाने की राज्य की जरूरत बनाम वह अनौपचारिक अर्थव्यवस्था, जिस पर दशकों से हजारों परिवार निर्भर हैं।

चाहे आप इन कानूनी ढांचों को समझने की कोशिश करें या इन ऑनलाइन अभियानों की प्रशासनिक पहुंच के बारे में जानें, मूल समस्या बीच का रास्ता न निकल पाना है। जैसे-जैसे बंगाल इन ध्वस्तीकरण अभियानों को देख रहा है, 'विकास बनाम विस्थापन' की बहस तेज होती जा रही है। अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि ये अभियान जारी रहेंगे, ऐसे में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने बुनियादी ढांचा लक्ष्यों और पटरियों के किनारे रहने वाले लोगों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण के बीच संतुलन बनाने की है।

द्वारा अर्जुन मेहता
राष्ट्रीय मामले संवाददाता

अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।