पेपर लीक से आगे: NEET के लिए NTA का नया 'जीरो-ट्रस्ट' प्रोटोकॉल
घड़ियां-कैमरे भी NTA के ही लगेंगे, NEET री-एग्जाम के लिए पहली बार ऐसे इंतजाम

NEET परीक्षा की पवित्रता में छात्रों का भरोसा बहाल करने की एक हताश कोशिश में, टेस्टिंग एजेंसी अब परीक्षा केंद्रों की स्वायत्तता खत्म कर रही है। इसके तहत अब निगरानी और समय निर्धारण के उपकरण पूरी तरह से केंद्रीय नियंत्रण में होंगे।
हाल ही में हुए NEET पेपर लीक के साये ने नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) को अपनी कार्यप्रणाली में आमूलचूल बदलाव के लिए मजबूर कर दिया है। पहली बार, एजेंसी परीक्षा केंद्रों के स्थानीय बुनियादी ढांचे पर निर्भर रहने के बजाय खुद कमान संभाल रही है। नई सुरक्षा व्यवस्था के तहत, केंद्रों की अपनी दीवारों पर लगी घड़ियों और निजी CCTV सेटअप को दरकिनार किया जा रहा है। इसके बजाय, NTA हर केंद्र पर अपनी मानकीकृत घड़ियां और डिजिटल सर्विलांस कैमरे लगाएगी, ताकि स्थानीय स्तर पर मिलीभगत या समय के साथ छेड़छाड़ की किसी भी संभावना को खत्म किया जा सके।
स्थानीय स्वायत्तता का अंत
सालों तक, NEET प्रक्रिया की अखंडता इस भरोसे पर टिकी थी कि परीक्षा केंद्र पेपर के जिम्मेदार संरक्षक के रूप में काम करेंगे। लेकिन लीक की घटनाओं ने इस भरोसे को चकनाचूर कर दिया, जिसके बाद देशव्यापी विरोध प्रदर्शन और तीखी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। केंद्रों को NTA के उपकरण इस्तेमाल करने के लिए मजबूर करके, एजेंसी प्रभावी रूप से 'जीरो-ट्रस्ट' (शून्य-विश्वास) नीति अपना रही है। यह केवल नकल रोकने के बारे में नहीं है; बल्कि उन लाखों छात्रों को यह संदेश देने के बारे में है जो सिस्टम को धांधली वाला मानते हैं कि अब परीक्षा का माहौल एकसमान, निगरानी में और सीधे केंद्रीय नियंत्रण के अधीन होगा।
दबाव में सिस्टम
छात्रों और शिक्षकों का आक्रोश लगातार बना हुआ है। पटना में खान सर जैसे लोगों की आवाज़ से लेकर आजतक (AajTak) और NDTV जैसे नेटवर्क की कवरेज तक, आम सहमति साफ है: NTA की विश्वसनीयता अब तक के सबसे निचले स्तर पर है। राजनीतिक असर भी उतना ही गहरा है, जहां राहुल गांधी जैसे नेता उस संस्था की प्रणालीगत विफलताओं पर सवाल उठा रहे हैं जिसे योग्यता के आधार पर निष्पक्ष खेल का मैदान सुनिश्चित करना था। स्थानीय बुनियादी ढांचे को बदलने का मौजूदा कदम, उन 'लीक-टेंट्स' (लीक सिंडिकेट्स) के आरोपों का सीधा, हालांकि प्रतिक्रियावादी जवाब है, जिन्होंने परीक्षा की पवित्रता को दांव पर लगा दिया है।
यह क्यों मायने रखता है: विश्वसनीयता का संकट
यह सिर्फ एक लॉजिस्टिक अपग्रेड नहीं है; यह एक डूबते जहाज को बचाने की हताश कोशिश है। हालांकि सीधे नियंत्रण में कैमरे और घड़ियां लगाने से स्थानीय स्तर की अनियमितताएं रुक सकती हैं, लेकिन यह बीमारी का नहीं, केवल लक्षणों का इलाज है। NTA के लिए असली परीक्षा सिर्फ हार्डवेयर की नहीं है—यह इस बात की है कि क्या उसकी आंतरिक निगरानी व्यवस्था उच्च दबाव वाले माहौल में टिक पाएगी। यदि NTA जनता का भरोसा फिर से जीतना चाहती है, तो उसे यह साबित करना होगा कि वह प्रेस से लेकर क्लासरूम तक, परीक्षा की पूरी सप्लाई चेन को सुरक्षित कर सकती है। तब तक, हर नए सुरक्षा उपाय को अभिभावक और छात्र संदेह की नजर से ही देखेंगे।
आगे की राह
क्या ये अभूतपूर्व इंतजाम परीक्षा को भविष्य के लीक से बचाने के लिए पर्याप्त होंगे, यह अभी भी एक बड़ा सवाल है। फिलहाल, पूरी नजर आगामी री-एग्जाम पर है। जैसे-जैसे एजेंसी विवादों से आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है, उसके सामने यह साबित करने की चुनौती है कि 'लीक-प्रूफ' का टैग सिर्फ एक नौकरशाही वादा नहीं है। पूरा शिक्षा और रोजगार क्षेत्र यह देखने के लिए इंतजार कर रहा है कि क्या ये तकनीकी सुरक्षा उपाय वास्तविक सुधार का संकेत हैं या फिर एक टूटे हुए सिस्टम के लिए सिर्फ दिखावटी मरहम।
अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।