कार्रवाई से परे: तमिलनाडु के सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट को केवल अनुशासन की नहीं, सुधारों की है जरूरत
डॉक्टरों की अनुपस्थिति पर कार्रवाई के बाद तमिलनाडु के सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में व्यवस्थागत सुधारों की मांग तेज

जैसे-जैसे राज्य सरकार बिना अनुमति अनुपस्थित रहने वाले 1,420 पोस्टग्रेजुएट डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है, कर्मचारियों की कमी और वेतन में असमानता जैसी बुनियादी समस्याएं सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की रीढ़ को कमजोर करती दिख रही हैं।
तमिलनाडु स्वास्थ्य विभाग के हालिया फैसले ने, जिसमें बिना अनुमति अनुपस्थित रहने और सर्विस बॉन्ड के उल्लंघन के लिए 1,420 सरकारी डॉक्टरों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई है, एक तीखी बहस छेड़ दी है। हालांकि इस कदम को जवाबदेही तय करने के लिए जरूरी बताया जा रहा है—ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि जिन लोगों ने राज्य-सब्सिडी वाली पोस्टग्रेजुएट शिक्षा का लाभ उठाया है, वे अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करें—लेकिन चिकित्सा जगत की प्रतिक्रिया एक गहरे और संरचनात्मक संकट की ओर इशारा करती है।
सेवा की कीमत
इस मुद्दे के केंद्र में राज्य की अपेक्षाओं और जमीनी हकीकत के बीच बढ़ती खाई है। सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का तर्क है कि जवाबदेही की मांग जायज है, लेकिन डॉक्टरों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई उन व्यवस्थागत विफलताओं को नजरअंदाज करती है जो उन्हें सिस्टम से दूर कर रही हैं। कई डॉक्टरों के लिए, नौकरी छोड़ना केवल अनुबंध का उल्लंघन नहीं, बल्कि काम की असहनीय परिस्थितियों के खिलाफ एक प्रतिक्रिया है।
डॉक्टरों का कहना है कि वेतन में ऐसी विसंगति है कि उन्हें केंद्र सरकार या पड़ोसी राज्यों के डॉक्टरों की तुलना में 30% से 50% तक कम वेतन मिलता है। एक दशक के कठोर प्रशिक्षण और भारी वित्तीय निवेश के बाद, कई डॉक्टर खुद को एक ऐसी व्यवस्था में फंसा हुआ पाते हैं जो उनके पेशेवर मूल्य को नहीं पहचानती। यह वित्तीय असमानता कर्मचारियों की उस गंभीर कमी से और बढ़ जाती है, जिसे दो दशकों से काफी हद तक अनसुलझा छोड़ दिया गया है।
बर्नआउट और व्यवस्थागत पतन
सरकारी अस्पतालों में रोजमर्रा का काम अब असहनीय होता जा रहा है। एक प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ ने बताया कि वर्षों में मरीजों की संख्या तो तेजी से बढ़ी है, लेकिन स्वीकृत जनशक्ति स्थिर बनी हुई है। विमानन उद्योग के विपरीत, जो पायलटों के उड़ान के घंटों पर सख्त सीमा लागू करता है, राज्य के सरकारी डॉक्टरों को अक्सर 36 घंटे की शिफ्ट करने के लिए मजबूर किया जाता है।
अत्यधिक काम की यह संस्कृति 'बर्नआउट' का एक ऐसा चक्र बनाती है जिसमें पेशेवर विकास या मरीज की सुरक्षा के लिए बहुत कम जगह बचती है। कई डॉक्टर सिस्टम के कारण नहीं, बल्कि सिस्टम के बावजूद सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में बने हुए हैं और एक ऐसे नाजुक ढांचे को संभाले हुए हैं जो अपने ही ठहराव के दबाव में चरमरा रहा है।
बड़ी तस्वीर
इस गतिरोध के निहितार्थ तत्काल अनुशासनात्मक कार्रवाई से कहीं आगे तक जाते हैं। यदि सरकार इन मुद्दों को केवल अनुपस्थिति के अलग-थलग मामले मानती रहेगी और इसे कार्यबल की थकान के लक्षण के रूप में नहीं देखेगी, तो 'ब्रेन ड्रेन' (प्रतिभा पलायन) का खतरा स्थायी हो जाएगा। एक सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली जो प्रतिस्पर्धी वेतन या काम के उचित घंटे दिए बिना केवल अत्यधिक काम करने वाले कर्मचारियों के समर्पण पर निर्भर है, वह स्वाभाविक रूप से अस्थिर है।
इस संकट को हल करने के लिए केवल प्रशासनिक सख्ती की नहीं, बल्कि मानव पूंजी में राज्य के निवेश को फिर से तौलने की जरूरत है। जब तक सरकार वेतन के अंतर को पाटने और आधुनिक चिकित्सा मानकों के अनुरूप अपने स्टाफिंग नियमों को अपडेट नहीं करती, तब तक प्रतिभाओं का पलायन जारी रहेगा, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता और कम होती जाएगी।
रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।