बादलों के पार: डॉ. प्रिया सेल्वराज ने कैसे माउंट एवरेस्ट और अपनी सीमाओं को फतह किया
चेन्नई की डॉ. प्रिया सेल्वराज की कहानी: बर्फीली खाई में गिरने के बावजूद एवरेस्ट फतह करने का सफर

चेन्नई की उमस भरी आबोहवा से लेकर हिमालय के 'डेथ ज़ोन' तक, डॉ. प्रिया सेल्वराज का माउंट एवरेस्ट फतह करने का सफर साहस, चिकित्सकीय सटीकता और गहरे व्यक्तिगत बदलाव की एक प्रेरणादायक कहानी है।
8,000 मीटर की ऊंचाई पर हवा न केवल पतली हो जाती है, बल्कि यह जीवन की तुच्छताओं को भी मिटा देती है। चेन्नई की मेडिकल प्रोफेशनल डॉ. प्रिया सेल्वराज के लिए माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने का फैसला किसी रिकॉर्ड की महिमा या तमिल सिनेमा के दिग्गज जेमिनी गणेशन की पोती होने के नाते प्रतिष्ठा पाने के लिए नहीं था। इसके बजाय, यह कोविड के बाद के वर्षों के गहरे आत्म-चिंतन से पैदा हुआ था। दुनिया के शोर-शराबे से दूर, उन्होंने पहाड़ों की ओर रुख किया—एक विजेता के रूप में नहीं, बल्कि धैर्य के एक विद्यार्थी के रूप में।
मरीना बीच से 'डेथ ज़ोन' तक
समुद्र तल पर स्थित शहर से दुनिया की सबसे ऊंची चोटी के लिए प्रशिक्षण लेना एक बड़ी लॉजिस्टिक चुनौती थी। राष्ट्रीय स्तर की एथलीट और डेंटिस्ट डॉ. सुनाप्रदीप के साथ काम करते हुए, सेल्वराज ने अपने हाई-प्रेशर मेडिकल करियर और कठोर ट्रेनिंग रूटीन के बीच संतुलन बनाया। उनकी दिनचर्या में अस्पताल के रैंप, होम जिम और मरीना बीच की रेतीली जमीन शामिल थी। उनकी यह तैयारी—मुए थाई (Muay Thai), कार्डियोवैस्कुलर कंडीशनिंग और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग का मिश्रण—हाई-एल्टीट्यूड तकनीकी चढ़ाई की मांगों को पूरा करने के लिए तैयार की गई थी।
एवरेस्ट फतह करने से पहले, उन्होंने संदकफू फालुट और खोप्रा रिज जैसे कठिन ट्रेक पूरे किए। इसके बाद उन्होंने किलिमंजारो की सफल चढ़ाई की और लोबुचे ईस्ट जैसी तकनीकी चुनौती को पार किया। जब वह माउंट मनासलू—अपनी पहली 8,000 मीटर ऊंची चोटी—पर पहुंचीं, तो उन्हें एहसास हुआ कि पहाड़ एक अनूठी थेरेपी प्रदान करते हैं। उन्होंने मानसिक लचीलेपन के उस स्तर की मांग की, जो उनके पेशेवर जीवन में भी काम आया, जिससे उन्हें अस्पताल में महत्वपूर्ण निर्णय लेते समय शांत और सटीक रहने में मदद मिली।
मौत के मुहाने से वापसी
एवरेस्ट अभियान खतरों से खाली नहीं था। रिपोर्ट्स के अनुसार, चढ़ाई के दौरान वह एक बर्फीली खाई (crevasse) में गिर गई थीं, जो 'डेथ ज़ोन' में जीत और त्रासदी के बीच की महीन रेखा की एक कठोर याद दिलाती है। फिर भी, सेल्वराज के लिए यह चढ़ाई एक आध्यात्मिक अभ्यास बनी रही। मनासलू की सफलता और एवरेस्ट के प्रयास के बीच साढ़े छह महीने के अंतराल के बाद, उन्होंने पहाड़ को जीतने के बजाय उसे आत्मसमर्पण के नजरिए से देखा। उनका ध्यान "भावनाओं पर नियंत्रण और डर को शांत करने" पर था, एक ऐसा दर्शन जिसने उन्हें चढ़ाई की तकनीकी कठिनाइयों से पार पाने में मदद की।
बड़ी तस्वीर
यह महत्वपूर्ण क्यों है? सेल्वराज की यात्रा उन पेशेवरों के बीच बढ़ते रुझान को दर्शाती है जो तनावपूर्ण शहरी वातावरण में काम करते हैं और अपने मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए एक्सट्रीम एंड्योरेंस स्पोर्ट्स की ओर रुख कर रहे हैं। यह अब केवल फिटनेस के बारे में नहीं है; यह उन 'मांगों' के बारे में है जो पहाड़ एक व्यक्ति पर डालता है। डिजिटल युग में जहां अहंकार और बर्नआउट आम हैं, 8,000 मीटर की चढ़ाई का धीमा और संयमित दृष्टिकोण एक शक्तिशाली औषधि के रूप में कार्य करता है। द हिंदू और हिंदुस्तान टाइम्स जैसे मीडिया आउटलेट्स में व्यापक रूप से कवर की गई उनकी सफलता यह बताती है कि आधुनिक उपलब्धि हासिल करने वाले लोग यह समझ रहे हैं कि सबसे कठिन पहाड़ अक्सर वे होते हैं जो हमारे भीतर हैं।
कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।