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नीली पुस्तिका से परे: सरकार क्यों कहती है कि पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है

सरकार ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट कभी भी नागरिकता का प्रमाण नहीं रहा; 1967 के अधिनियम और बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले का दिया हवाला

द्वारा अर्जुन मेहताप्रकाशित 25 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
नीली पुस्तिका से परे: सरकार क्यों कहती है कि पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है
नीली पुस्तिका से परे: सरकार क्यों कहती है कि पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है

केंद्र का यह दावा कि पासपोर्ट केवल एक यात्रा दस्तावेज है, इस बात पर तीखी राजनीतिक बहस छिड़ गई है कि आखिर भारतीय होने का अंतिम प्रमाण क्या है।

दशकों से, नीले रंग के भारतीय पासपोर्ट को अधिकांश नागरिक पहचान के 'गोल्ड स्टैंडर्ड' के रूप में देखते आए हैं। हालाँकि, विदेश मंत्रालय (MEA) के हालिया स्पष्टीकरण ने इस धारणा को तोड़ दिया है। मंत्रालय का कहना है कि पासपोर्ट कभी भी नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं रहा है और न ही इसे कभी ऐसा माना गया था। यह स्थिति नई नहीं है, लेकिन इसने राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है, जहाँ विपक्ष भारतीय पहचान के दस्तावेजों के व्यापक ढांचे पर इसके निहितार्थों पर सवाल उठा रहा है।

कानूनी स्थिति

सरकार का रुख 'पासपोर्ट अधिनियम, 1967' पर आधारित है। विशेष रूप से, इस अधिनियम की धारा 20 कार्यपालिका को उन व्यक्तियों को पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी करने की शक्ति देती है जो भारत के नागरिक नहीं हैं, बशर्ते सरकार इसे 'जनहित' में मानती हो। इसका हवाला देते हुए सरकार का तर्क है कि चूंकि यह दस्तावेज कानूनी रूप से गैर-नागरिकों को भी जारी किया जा सकता है, इसलिए यह नागरिकता का पूर्ण प्रमाण नहीं हो सकता।

यह कोई अचानक लिया गया नीतिगत बदलाव नहीं है। इस कानूनी स्थिति को अदालतों में भी परखा गया है, जिसमें 2013 का बॉम्बे हाईकोर्ट का एक फैसला भी शामिल है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि केवल पासपोर्ट का होना किसी व्यक्ति की नागरिकता की स्थिति को स्थापित नहीं करता है। सरकार का कहना है कि वह केवल एक लंबे समय से स्थापित कानूनी वास्तविकता को दोहरा रही है।

राजनीतिक घमासान

राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल द्वारा सोशल मीडिया पर विदेश मंत्रालय के रुख को चुनौती देने के बाद यह बहस और तेज हो गई। सिब्बल ने चिंता जताई कि यदि पासपोर्ट—जो सरकार द्वारा जारी एक प्रमुख दस्तावेज है—को केवल एक यात्रा कागज बना दिया जाता है, तो यह आम नागरिक को स्थानीय अधिकारियों की नौकरशाही जांच के प्रति असुरक्षित बना देता है। गीतकार जावेद अख्तर ने भी इस पर सवाल उठाते हुए इसे 'बेतुका' बताया और पूछा कि किन परिस्थितियों में सरकार गैर-नागरिकों को पासपोर्ट जारी करेगी।

बीजेपी ने पलटवार करते हुए पार्टी के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने इस आक्रोश को 'दिखावा' करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि आलोचक विवाद पैदा करने के लिए एक स्पष्ट कानूनी स्थिति को गलत तरीके से पेश कर रहे हैं। सरकार के लिए, नैरेटिव स्पष्ट है: नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है, बस सार्वजनिक गलतफहमियों को वैधानिक प्रावधानों पर हावी न होने देने का प्रयास है।

यह क्यों मायने रखता है

यह बहस भारत के राजनीतिक माहौल में दस्तावेजों और नागरिकता को परिभाषित करने की राज्य की शक्ति को लेकर गहरी चिंता को उजागर करती है। जब 'नागरिक' की परिभाषा उन कानूनी बारीकियों से जुड़ जाती है जो सार्वजनिक धारणा से टकराती हैं, तो यह विश्वास का एक शून्य पैदा करती है।

बड़ी तस्वीर पासपोर्ट के बारे में नहीं, बल्कि एक ऐसे एकल, सर्वमान्य दस्तावेज के अभाव के बारे में है जो कानून की नजर में किसी व्यक्ति की नागरिकता की स्थिति को निश्चित रूप से तय कर सके। जब तक यह अस्पष्टता बनी रहेगी, सरकार के हर स्पष्टीकरण को संभावित अधिकारों से वंचित करने के नजरिए से देखा जाएगा, जिससे 'मैं भारतीय हूँ, इसका प्रमाण क्या है' का सवाल हमारे राष्ट्रीय विमर्श में एक बार-बार उभरने वाली दरार बना रहेगा।

द्वारा अर्जुन मेहता
राष्ट्रीय मामले संवाददाता

अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।