बेंगलुरु कोर्ट ने RSS मानहानि मामले में प्रियांक खड़गे की याचिका खारिज की
बेंगलुरु की विशेष अदालत ने प्रियांक खड़गे के इस दावे को ठुकरा दिया कि RSS एक पंजीकृत संगठन नहीं है, इसलिए इसका सदस्य मानहानि का मुकदमा नहीं कर सकता
एक विशेष अदालत ने फैसला सुनाया है कि RSS के व्यक्तिगत सदस्य कानूनी रूप से मानहानि की शिकायत दर्ज करने के हकदार हैं। अदालत ने मंत्री के इस तर्क को खारिज कर दिया कि संगठन का पंजीकृत न होना ऐसे दावों को अमान्य बनाता है।
कर्नाटक में राजनीतिक बयानबाजी को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई ने एक नया मोड़ ले लिया है। बेंगलुरु में सांसदों और विधायकों से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाली एक विशेष अदालत ने आधिकारिक तौर पर राज्य के मंत्री प्रियांक खड़गे द्वारा उठाए गए तर्क को खारिज कर दिया है। मंत्री ने तर्क दिया था कि RSS का कोई सदस्य आपराधिक मानहानि की शिकायत नहीं कर सकता क्योंकि यह संगठन औपचारिक रूप से पंजीकृत नहीं है। जज संदीप पाटिल ने इस दावे को "पूरी तरह से अस्थिर" बताते हुए खारिज कर दिया, जिससे मंत्री के खिलाफ मामला आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो गया है।
यह शिकायत बेंगलुरु के RSS सदस्य तेजस ए. द्वारा दायर की गई है, जो अक्टूबर 2025 में की गई टिप्पणियों पर केंद्रित है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि प्रियांक खड़गे ने मोहम्मद हारिस नलपाड और पूर्व मंत्री दिनेश गुंडू राव के साथ मिलकर विभिन्न मीडिया मंचों पर RSS और उसके सदस्यों के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया। हालांकि अदालत ने श्री राव के खिलाफ कार्यवाही को बंद कर दिया, लेकिन उसने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 356 के तहत श्री खड़गे और श्री नलपाड के खिलाफ अपराध का संज्ञान लेने के लिए प्रथम दृष्टया पर्याप्त सबूत पाए हैं।
अदालत का तर्क
27 जून के अपने आदेश में, जज पाटिल ने उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट के स्थापित न्यायिक मिसालों का हवाला दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि RSS एक "पहचान योग्य निकाय या व्यक्तियों का वर्ग" है, जिसका अर्थ है कि संगठन के खिलाफ की गई अपमानजनक टिप्पणियों को उसके व्यक्तिगत सदस्यों द्वारा चुनौती दी जा सकती है।
अदालत की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बचाव पक्ष की रणनीति में विसंगति पर केंद्रित था। जज ने कहा कि आरोपी "एक ही समय में दोनों तरफ की बात नहीं कर सकते"। अपने सार्वजनिक बयानों में "RSS सदस्यों" और "स्वयंसेवकों" का उल्लेख करके, नेताओं ने पहले ही एक पहचान योग्य समूह के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया था। अदालत ने तर्क दिया कि वे अब केवल कानूनी शिकायत से बचने के लिए संगठन के अस्तित्व से इनकार नहीं कर सकते।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है
यह फैसला भारत में राजनीतिक विमर्श को नियंत्रित करने के तरीके के लिए काफी महत्वपूर्ण है। यह पुष्टि करके कि RSS मानहानि कानून के उद्देश्यों के लिए एक पहचान योग्य वर्ग के रूप में कार्य करता है, अदालत ने सार्वजनिक हस्तियों के लिए एक स्पष्ट सीमा तय कर दी है। यह संकेत देता है कि जब राजनेता बड़े और सुस्पष्ट संगठनों को निशाना बनाते हैं, तो उन्हें न केवल पूरे संगठन से, बल्कि उसका प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्तियों से भी कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
कर्नाटक सरकार के लिए, यह घटनाक्रम पहले से ही गरमाए हुए राजनीतिक माहौल में कानूनी जटिलता की एक और परत जोड़ता है। जैसे-जैसे मामला आगे बढ़ेगा, यह भविष्य के उन मुकदमों के लिए एक संदर्भ बिंदु के रूप में काम करेगा जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समूहों—चाहे वे पंजीकृत हों या नहीं—के अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करने के अधिकारों के बीच संतुलन बनाते हैं। राजनीतिक आलोचना और कार्रवाई योग्य मानहानि के बीच का अंतर लगातार कम होता जा रहा है, जिससे नेताओं पर अपनी बयानबाजी को सावधानीपूर्वक चुनने का दबाव और बढ़ गया है।
अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।