अयोध्या चढ़ावा विवाद: SIT जांच के बीच प्रियंका चतुर्वेदी ने 2020 की ऑडिट चेतावनियों को कुरेदा
चढ़ावा चोरी का मामला: प्रियंका चतुर्वेदी ने सरकार को दिलाई 2020 की याद, कहा- 6 साल पहले ही आगाह कर दिया गया था
जैसे-जैसे राम मंदिर चढ़ावे में कथित अनियमितताओं पर SIT अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सौंप रही है, शिवसेना (UBT) नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने वर्षों पहले दी गई उन आंतरिक ऑडिट चेतावनियों की ओर इशारा किया है, जिन्हें नजरअंदाज कर दिया गया था।
दिल्ली और लखनऊ के सत्ता के गलियारों में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को लेकर एक नया विवाद गरमाया हुआ है। वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोपों के बाद—जिसमें कुछ विपक्षी नेताओं ने चढ़ावे में हेराफेरी का आंकड़ा ₹200 करोड़ तक होने का अनुमान लगाया है—अब यह मामला केवल आरोपों से आगे बढ़कर दस्तावेजी लापरवाही तक पहुंच गया है। शिवसेना (UBT) नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने इस बहस को फिर से हवा दी है। उन्होंने उन आंतरिक ऑडिट सिफारिशों का जिक्र किया है, जिन्हें मंदिर के मौजूदा प्रशासनिक संकट से बहुत पहले ही फाइलों में दबा दिया गया था।
वह ऑडिट जिसे कभी लागू नहीं किया गया
चतुर्वेदी की आलोचना ट्रस्ट की प्रशासनिक व्यवस्था की समयसीमा पर केंद्रित है। उनके अनुसार, 2020 में ट्रस्ट के गठन के तुरंत बाद, जोखिम प्रबंधन और आंतरिक नियंत्रण पर सलाह देने के लिए एक ऑडिट फर्म को नियुक्त किया गया था। कथित तौर पर फर्म ने महत्वपूर्ण खामियों की पहचान की थी और दान व कीमती धातुओं को सुरक्षित रखने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का सुझाव दिया था। चतुर्वेदी ने सोशल मीडिया पर कहा, "उन्हें 6 साल पहले ही चेतावनी दी गई थी," और आरोप लगाया कि इन पेशेवर सुझावों को लागू न करने के कारण ही नकदी और गहनों की चोरी का यह 'महापाप' संभव हुआ।
योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा इन दावों की जांच के लिए गठित SIT ने इस मंगलवार को अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद को अपनी 150 पन्नों की प्रारंभिक रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट के निष्कर्ष चिंताजनक हैं: तीन सदस्यीय टीम ने कथित तौर पर गिनती की प्रक्रिया में बड़ी अनियमितताओं, सीसीटीवी फुटेज के गायब होने या डिलीट किए जाने और सोने-चांदी के आभूषणों का कोई व्यवस्थित रिकॉर्ड न होने की पुष्टि की है। इस सप्ताह के भीतर अंतिम रिपोर्ट आने की उम्मीद है, जिसे आगे की प्रशासनिक या कानूनी कार्रवाई के लिए मुख्यमंत्री के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
यह घटना केवल प्रशासनिक चूक का मामला नहीं है; यह भारत में हाई-प्रोफाइल धार्मिक ट्रस्टों के शासन मॉडल पर सीधा प्रहार है। जब इतनी बड़ी राष्ट्रीय और धार्मिक महत्ता वाले स्थान का प्रबंधन 'महाभ्रष्टाचार' के आरोपों का सामना करता है, तो यह सार्वजनिक चंदे की निगरानी करने वाले तंत्र पर असहज सवाल खड़े करता है। राज्य सरकार के लिए चुनौती दोहरी है: दान प्रक्रिया की अखंडता सुनिश्चित करना और मंदिर प्रशासन को राजनीतिक संरक्षण की धारणा से बचाना। इस मामले में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव जैसे नेताओं का नाम आने से राजनीतिक गर्मी बढ़ गई है, जो दर्शाता है कि विपक्ष इन वित्तीय खामियों को जवाबदेही के व्यापक सवालों से जोड़कर भाजपा सरकार पर दबाव बनाए रखना चाहता है।
हालांकि राजनीतिक चर्चा अक्सर अरविंद केजरीवाल जैसे चेहरों की ओर मुड़ जाती है, लेकिन वर्तमान में पूरा ध्यान मंदिर ट्रस्ट के भीतर की प्रक्रियात्मक विफलताओं पर है। यह पैटर्न बताता है कि जैसे-जैसे ये संस्थान बड़े होते हैं, उनके पारंपरिक प्रबंधन ढांचे और वित्तीय ऑडिट की आधुनिक, उच्च-स्तरीय आवश्यकताओं के बीच का अंतर एक बड़ी कमजोरी बना रहता है। यह SIT रिपोर्ट व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन लाएगी या केवल एक जांच बनकर रह जाएगी, यह मंदिर के वित्तीय प्रबंधन की भविष्य की विश्वसनीयता तय करेगा।
प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।