Politicalpedia
राज्य

नबन्ना में नया रंग: बंगाल में सत्ता परिवर्तन की झलक राज्य सचिवालय के मेकओवर में

रंग दे तू मोहे... नबन्ना परिसर में केसरिया रंग की शुरुआत, बदलाव का दौर शुरू

द्वारा रोहन गुप्ताप्रकाशित 12 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
नबन्ना में नया रंग: बंगाल में सत्ता परिवर्तन की झलक राज्य सचिवालय के मेकओवर में
नबन्ना में नया रंग: बंगाल में सत्ता परिवर्तन की झलक राज्य सचिवालय के मेकओवर में

मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में प्रशासन के बदलते ही, नबन्ना की प्रतिष्ठित नीली-सफेद इमारत को अब केसरिया रंग में बदला जा रहा है। यह पिछले एक दशक की सौंदर्यबोध और राजनीतिक ब्रांडिंग से एक बड़े बदलाव का संकेत है।

पश्चिम बंगाल के शासन की दृश्य भाषा में तेजी से बदलाव आ रहा है। राज्य में सत्ता परिवर्तन के कुछ ही दिनों बाद, नबन्ना विधानसभा हॉल के भीतर श्रमिकों को केसरिया और सफेद रंग की नई परतें चढ़ाते देखा गया। हालांकि लोक निर्माण विभाग ने अभी तक राज्य सचिवालय के बाहरी हिस्से के पूर्ण कायाकल्प के लिए औपचारिक निविदाएं जारी नहीं की हैं, लेकिन यह बदलाव स्पष्ट है। यह कदम उस नीली-सफेद थीम से एक तीखा मोड़ है जिसने ममता बनर्जी प्रशासन के पिछले पंद्रह वर्षों को परिभाषित किया था—एक ऐसा रंग संयोजन जिसे व्यापक रूप से पूर्व मुख्यमंत्री की पहचान के रूप में देखा जाता था।

नीली-सफेद युग का अंत

एक दशक से अधिक समय तक, नीली-सफेद रंग की योजना पूरे बंगाल में हर जगह दिखाई देती थी। यह केवल सरकारी इमारतों तक ही सीमित नहीं थी; यह सड़क विभाजकों, सार्वजनिक बुनियादी ढांचे और राज्य द्वारा संचालित परियोजनाओं तक फैली हुई थी। आलोचकों का अक्सर तर्क था कि यह रंग चयन पेशेवर तटस्थता से रहित था और एक मानक प्रशासनिक डिजाइन के बजाय राजनीतिक छाप के रूप में अधिक कार्य कर रहा था। अतीत में, भारतीय राज्य सचिवालयों में ऐसी रंग कोडिंग शायद ही कभी देखी गई थी, जो आमतौर पर एक तटस्थ या पारंपरिक सौंदर्य बनाए रखते थे। जबकि जयपुर जैसे शहरों ने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संरक्षण के कारण 'पिंक सिटी' का नाम कमाया, बंगाल में नीली-सफेद ब्रांडिंग को व्यापक रूप से व्यक्तिगत और पार्टी-नेतृत्व वाली आइकनोग्राफी के रूप में देखा गया।

दक्षता और गति: नई प्रशासनिक रफ्तार

पर्यवेक्षकों का मानना है कि पेंट में बदलाव व्यापक प्रशासनिक पुनर्संतुलन का केवल सबसे दृश्य संकेत है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के तहत, शासन की गति तेज हो गई है, जिसमें राज्य और दिल्ली में केंद्र सरकार के बीच बेहतर समन्वय की खबरें आ रही हैं। पिछली, अधिक केंद्रीकृत निर्णय लेने की शैली के विपरीत, वर्तमान प्रशासन एक 'रॉकेट-स्पीड' डिलीवरी मॉडल पर जोर देता दिख रहा है। क्या अधिक एकीकृत प्रशासनिक दृष्टिकोण की ओर यह बदलाव सफल होगा, यह नई सरकार के लिए सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है।

यह क्यों मायने रखता है: राजनीति और दिखावट

रंगों में यह बदलाव भारतीय राजनीति में 'ऑप्टिक्स' (दिखावट) का एक क्लासिक मामला है, जहां सार्वजनिक स्थान पर पुनः दावा करना पिछले शासन के निश्चित अंत का संकेत देने के लिए उपयोग किया जाता है। चुनाव परिणामों के इर्द-गिर्द होने वाली चर्चाओं की तरह—जैसा कि हाल ही में बिहार 2025 चुनाव चक्र में देखा गया जहां 'रंग दे मोहे गेरुआ' एक नारा बन गया था—नबन्ना की रंगाई नौकरशाही और जनता दोनों के लिए एक मनोवैज्ञानिक संकेत के रूप में कार्य करती है।

हालांकि, विशेषज्ञ सतर्क हैं। जबकि नीली-सफेद रंग की गंभीरता की कमी के लिए आलोचना की गई थी, लेकिन इसे केसरिया और सफेद रंग से बदलने पर संदेह है कि क्या यह वास्तव में एक पेशेवर, तटस्थ और गंभीर सचिवालय की आवश्यकता को पूरा करता है। किसी भी सरकार के लिए, चुनौती प्रतीकात्मक ब्रांडिंग को जनता के निष्पक्ष सदन के रूप में दिखने की वस्तुनिष्ठ आवश्यकता के साथ संतुलित करने में निहित है। जैसे-जैसे राज्य आगे बढ़ रहा है, इस प्रशासन की सफलता को संभवतः दीवारों के रंग के बजाय नीतिगत परिणामों से मापा जाएगा।

द्वारा रोहन गुप्ता
बिज़नेस संवाददाता

रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।