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मुश्किल से मिली शांति: परियाथुकावु भूमि विवाद का हुआ समाधान

परियाथुकावु भूमि विवाद में सुलह समझौते पर हस्ताक्षर

द्वारा कबीर शर्माप्रकाशित 16 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
मुश्किल से मिली शांति: परियाथुकावु भूमि विवाद का हुआ समाधान
मुश्किल से मिली शांति: परियाथुकावु भूमि विवाद का हुआ समाधान

मलयािदमथुरुथ के सात दलित परिवारों को आखिरकार स्थायी घर मिल जाएंगे। सरकार की मध्यस्थता में हुए इस समझौते ने बेदखली की धमकियों और कानूनी विवादों के एक कठिन दौर को खत्म कर दिया है।

परियाथुकावु के इन सात दलित परिवारों के लिए पिछले कुछ साल विस्थापन के डर के साये में बीते हैं। स्वर्गीय कन्नट संकरन नायर के वारिसों के साथ लंबी कानूनी लड़ाई का केंद्र रही इस जमीन पर रहने वाले इन परिवारों का भविष्य अनिश्चित था। अदालत के आदेश पर बेदखली की कोशिशों ने विरोध प्रदर्शनों और स्थानीय तनाव को जन्म दिया था। सोमवार, 15 जून को जिला कलेक्टर के कार्यालय में हुए औपचारिक समझौते के साथ ही यह अनिश्चितता आखिरकार खत्म हो गई।

यह समझौता मलयािदमथुरुथ में पहले से चले आ रहे तनावपूर्ण माहौल में एक बड़ा बदलाव लेकर आया है। समझौते की शर्तों के तहत, कन्नट परिवार प्रत्येक सात परिवारों को पांच-पांच सेंट जमीन देने पर सहमत हो गया है। सरकार ने इस कमी को पूरा करने के लिए कदम आगे बढ़ाते हुए प्रायोजन (स्पॉन्सरशिप) के जरिए प्रत्येक परिवार के लिए 1,000 वर्ग फुट के घर बनाने का वादा किया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि निवासी तब तक अपने वर्तमान घरों में रहेंगे जब तक कि उनके नए स्थायी घर रहने के लिए तैयार नहीं हो जाते। इस पूरी प्रक्रिया के एक साल के भीतर पूरा होने की उम्मीद है।

समझौते की रूपरेखा

समझौते को लागू करने के लिए प्रशासनिक मशीनरी पहले से ही सक्रिय हो गई है। 30 जून तक, सर्वेक्षण के उप निदेशक नए भूखंडों का सीमांकन करेंगे और तीन मीटर चौड़ी पहुंच सड़क के निर्माण की देखरेख करेंगे, जिसे बाद में स्थानीय पंचायत को सौंप दिया जाएगा। निजी संपत्ति और निवासियों के नए भूखंडों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखने के लिए समझौते के तहत एक सीमा दीवार (बाउंड्री वॉल) बनाना अनिवार्य किया गया है।

इस ढांचे में जवाबदेही भी तय की गई है, जिसके तहत मुवाट्टुपुझा राजस्व संभागीय अधिकारी और पेरुम्बवूर के पुलिस उपाधीक्षक को साप्ताहिक प्रगति समीक्षा का जिम्मा सौंपा गया है। इसके अलावा, राज्य सरकार ने विरोध प्रदर्शनों के दौरान निवासियों के खिलाफ दर्ज सभी आपराधिक मामलों को वापस लेने की कानूनी प्रक्रिया शुरू करने का वादा किया है, जिससे उन लोगों को बड़ी राहत मिली है जिन्होंने बेदखली के खिलाफ संघर्ष किया था।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

यह समाधान केवल कागजी कार्रवाई नहीं है; यह ग्रामीण केरल में हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लिए भूमि अधिकारों की अनिश्चित स्थिति को उजागर करता है। परियाथुकावु मामला इस बात की याद दिलाता है कि कैसे कानूनी मालिकाना हक और लंबे समय से वहां रह रहे लोगों का जीवन अक्सर दो अलग-अलग समानांतर दुनिया की तरह होते हैं। हालांकि अदालत ने जमीन मालिकों के कानूनी हक को बरकरार रखा, लेकिन राज्य के हस्तक्षेप ने सामाजिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता दी है। सरकार ने बीच का रास्ता निकालकर—जहां जमीन दान में दी गई और बुनियादी ढांचे का खर्च राज्य ने उठाया—एक ऐसी जबरन बेदखली को टाल दिया है, जो बड़े सामाजिक असंतोष का रूप ले सकती थी।

अंततः, यह समझौता भविष्य में इसी तरह के भूमि विवादों को सुलझाने के लिए एक मिसाल पेश करता है। यह दर्शाता है कि जब राज्य एक सक्रिय मध्यस्थ की भूमिका निभाता है, तो गहरे विवादों को भी सुलझाया जा सकता है। अब इस समझौते की सफलता समय-सीमा पर निर्भर करती है। निगरानी समितियों के गठन के साथ, परियाथुकावु के परिवार अब बारीकी से नजर रखेंगे कि क्या ये वादे अगले जून तक ईंट-पत्थर की हकीकत में बदल पाते हैं या नहीं।

द्वारा कबीर शर्मा
फ़ीचर्स लेखक

कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।