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महाराष्ट्र में घटता लिंगानुपात: क्या 'बेटा' पाने की चाहत अब भी है भारी?

महाराष्ट्र को 'बेटा' चाहिए ? राज्य में 1000 लड़कों पर सिर्फ 888 बेटियां जबकि नेशनल एवरेज है 914

By PoliticalPedia Editorial DeskPublished 5 June 2026· 2 min read

सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की ताजा रिपोर्ट ने महाराष्ट्र में गिरते लिंगानुपात पर चिंता बढ़ा दी है, जो अब राष्ट्रीय औसत से भी नीचे खिसक गया है।

महाराष्ट्र के लिए एक चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं, जो समाज में बेटे की चाहत और गिरते लिंगानुपात की कड़वी सच्चाई को बयां करते हैं। नवीनतम सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र में प्रति 1000 लड़कों पर पैदा होने वाली लड़कियों की संख्या घटकर महज 888 रह गई है। यह आंकड़ा न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह 914 के राष्ट्रीय औसत से भी काफी कम है। यह गिरावट उस समय दर्ज की गई है जब देश भर में महिला स्वास्थ्य और सशक्तिकरण को लेकर कई तरह के जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं।

आंकड़ों में छिपा गहरा संकट

यह गिरावट उस सामाजिक मानसिकता की ओर इशारा करती है, जो आधुनिक दौर में भी पूरी तरह से नहीं बदली है। भले ही हमारे लाइफस्टाइल और शिक्षा के मानकों में बदलाव आया हो, लेकिन 'बेटा' पैदा करने की सामाजिक जिद अभी भी कई स्तरों पर हावी है। जब हम NDTV जैसे प्लेटफॉर्म्स पर स्वास्थ्य संबंधी चर्चाओं या पेरेंटिंग से जुड़े मुद्दों को देखते हैं, तो अक्सर लैंगिक समानता की बात होती है, लेकिन जमीन पर ये आंकड़े कुछ और ही कहानी कह रहे हैं।

राष्ट्रीय औसत बनाम महाराष्ट्र

राष्ट्रीय स्तर पर लिंगानुपात 914 है, जो स्वयं में एक संतोषजनक स्थिति नहीं है, लेकिन महाराष्ट्र का 888 पर होना एक गंभीर स्थिति पैदा करता है। इस डेटा को ndtvimg और अन्य सांख्यिकीय रिपोर्टों के साथ मिलाकर देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि राज्य के भीतर भ्रूण के लिंग परीक्षण और सामाजिक भेदभाव की कुप्रथाएं आज भी कहीं न कहीं सक्रिय हैं।

आगे की राह और चुनौतियां

इस विषय को केवल एक संख्या के रूप में देखना भूल होगी। यदि हम sports या entertainment जैसी अन्य श्रेणियों की तरह ही सामाजिक स्वास्थ्य के प्रति गंभीरता दिखाएं, तो ही इसमें सुधार संभव है। home-khabar पर उपलब्ध हालिया समाचारों के बीच, यह डेटा समाज के उस अंधेरे कोने को उजागर करता है जिसे अक्सर विकास की चकाचौंध में नजरअंदाज कर दिया जाता है। आने वाले समय में, प्रशासन और आम जनता को मिलकर इस मानसिकता पर प्रहार करने की जरूरत है, ताकि 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का नारा सिर्फ कागजों तक सीमित न रहे।

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