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क्या क्षेत्रीय दलों के लिए खत्म हो रहा है चुनावी 'होम ग्राउंड'?

क्या क्षेत्रीय दलों का दौर ढल रहा है?

By Priya NairPublished 14 June 2026· 3 min read
क्या क्षेत्रीय दलों के लिए खत्म हो रहा है चुनावी 'होम ग्राउंड'?
क्या क्षेत्रीय दलों के लिए खत्म हो रहा है चुनावी 'होम ग्राउंड'?

भारतीय राजनीति का भूगोल तेजी से बदल रहा है, जहाँ भाजपा के विस्तार और क्षेत्रीय क्षत्रपों के बिखराव ने सत्ता के समीकरणों को नए सिरे से परिभाषित कर दिया है।

पिछले एक दशक की भारतीय राजनीति पर नजर डालें, तो बदलाव केवल सत्ता के हस्तांतरण का नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक ढांचे के पुनर्गठन का है। 2014 में Shri Narendra Modi के नेतृत्व में भाजपा की धमक ने चुनावी समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। कभी हिंदी पट्टी तक सीमित मानी जाने वाली पार्टी आज पूर्वोत्तर से लेकर ओडिशा तक अपने पैर पसार चुकी है। भाजपा का यह 'ग्राउंड रिपोर्ट' विस्तार केवल चुनावी जीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विपक्ष की उस जगह को लगातार संकुचित कर रहा है जो दशकों से क्षेत्रीय दलों का गढ़ हुआ करती थी।

बिखराव की राजनीति

इस विस्तार के समानांतर एक ऐसी प्रक्रिया चल रही है जिसने कई क्षेत्रीय दिग्गजों को हाशिए पर धकेल दिया है। शिवसेना और एनसीपी का विभाजन हो, शिरोमणि अकाली दल का सिकुड़ना हो या फिर पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और ओडिशा में बीजू जनता दल जैसी मजबूत ताकतों का चुनावी दबाव में आना—यह सब एक बड़े बदलाव का संकेत है। आज बहुजन समाज पार्टी जैसी पार्टियां भी अपनी खोई हुई जमीन तलाशने के लिए संघर्ष कर रही हैं। भाजपा के शीर्ष नेता, चाहे वे प्रधानमंत्री Modi हों या केंद्रीय गृह Minister अमित शाह, लगातार देश भर में रैलियों और रोडशो के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय दलों के लिए अपने वोट बैंक को बचाए रखना एक कठिन चुनौती बन गया है।

बदलती धुरी और कांग्रेस की चुनौती

दूसरी ओर, Congress अपनी खोई हुई साख को बचाने के लिए नए सिरे से लामबंदी कर रही है। प्रियंका गांधी वाड्रा जैसे वरिष्ठ नेता अब भी जनसभाओं के जरिए जमीन पर उतरकर पार्टी को पुनर्जीवित करने की कोशिश में हैं। हालांकि, संसद में पेश होने वाले महत्वपूर्ण Bill हों या राज्यों के चुनाव, भाजपा का चुनावी तंत्र और 'संकल्प सप्ताह' जैसे कार्यक्रम एक ऐसा नैरेटिव सेट कर रहे हैं जिससे क्षेत्रीय दलों के पास अपने स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श में जोड़ने की जगह कम होती जा रही है।

नजरिया: क्या क्षेत्रीय दल अप्रासंगिक हो रहे हैं?

यह कहना कि क्षेत्रीय दलों का दौर पूरी तरह ढल चुका है, शायद जल्दबाजी होगी। 1980 और 90 के दशक में क्षेत्रीय दलों का उदय महज एक इत्तेफाक नहीं था; यह भाषा, संस्कृति, जाति और स्थानीय विकास की उन आकांक्षाओं से निकला था, जिन्हें राष्ट्रीय पार्टियां अक्सर नजरअंदाज कर देती थीं। समस्या यह है कि आज की राजनीति में क्षेत्रीय दल अपनी उसी विशिष्ट पहचान को बचाने के बजाय अस्तित्व की लड़ाई में उलझ गए हैं। यदि वे केवल राष्ट्रीय दलों के 'विस्तार' का जवाब देने में लगे रहेंगे, तो उनकी अपनी मौलिकता खो जाएगी। असली सवाल यह नहीं है कि वे खत्म हो रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या वे खुद को बदलकर नई पीढ़ी की उम्मीदों के साथ तालमेल बिठा पाएंगे।

आगे की राह

तेलंगाना विधानसभा से लेकर महाराष्ट्र की सियासी हलचल तक, हर राज्य की अपनी कहानी है। लेकिन एक पैटर्न साफ है—भाजपा का 'कैडर-बेस्ड' विस्तार और आक्रामक प्रचार शैली क्षेत्रीय दलों के लिए एक ऐसी चुनौती है जिसका मुकाबला पुरानी राजनीतिक रणनीति से करना नामुमकिन है। आने वाले समय में केवल वही दल टिक पाएंगे जो सत्ता के इन बड़े केंद्रों के बीच अपने स्थानीय 'होम' को सुरक्षित रखने में कामयाब होंगे।

By Priya Nair
Political Correspondent

Priya Nair covers parties, elections and the business of power for PoliticalPedia.