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भारतीय बैंक NRI डिपॉजिट के लिए क्यों बिछा रहे हैं रेड कार्पेट?

NRI निवेशकों के लिए सुनहरा मौका: बैंकों ने बढ़ाई डिपॉजिट पर ब्याज दरें

द्वारा अनन्या अय्यरप्रकाशित 14 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
भारतीय बैंक NRI डिपॉजिट के लिए क्यों बिछा रहे हैं रेड कार्पेट?
भारतीय बैंक NRI डिपॉजिट के लिए क्यों बिछा रहे हैं रेड कार्पेट?

जैसे-जैसे वैश्विक बाजार बदल रहे हैं, भारतीय बैंक बेहतर ब्याज दरों और नई FCNR योजनाओं के जरिए विदेशी मुद्रा जमा को आकर्षित करने में जुट गए हैं।

अनिवासी भारतीयों (NRI) के निवेश का परिदृश्य एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा बैंकों के लिए करेंसी हेजिंग लागत के नियमों में ढील देने के बाद, प्रमुख बैंकों ने इसका लाभ सीधे जमाकर्ताओं को देना शुरू कर दिया है। वैश्विक स्तर पर फैले भारतीय प्रवासियों के लिए यह अपनी विदेशी मुद्रा को भारतीय खातों में रखने का एक बेहतरीन अवसर है, क्योंकि कई बड़े बैंक अब FCNR(B) डिपॉजिट पर काफी बेहतर रिटर्न दे रहे हैं।

विदेशी पूंजी के लिए होड़

बैंकिंग क्षेत्र में यह बदलाव साफ नजर आ रहा है। ICICI बैंक ने 11 जून से अपनी NRI फिक्स्ड डिपॉजिट दरों को 6.50% पर सेट करके इस दौड़ की शुरुआत की। इसके बाद, भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने अपना "SBI एडवांटेज FCNR(B)" उत्पाद पेश किया है, जो विशेष रूप से तीन से पांच साल की अवधि वाले अमेरिकी डॉलर डिपॉजिट पर केंद्रित है। हालांकि इन डिपॉजिट्स में एक साल की अनिवार्य लॉक-इन अवधि होती है, लेकिन पांच साल की अवधि के लिए 6% तक का ब्याज इसे दीर्घकालिक पूंजी निवेश के लिए आकर्षक बनाता है।

रणनीति स्पष्ट है: बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करना चाहते हैं। उदाहरण के लिए, HDFC बैंक ने 10 जून से 30 सितंबर के बीच किए गए डिपॉजिट के लिए ब्याज दरों को बढ़ाकर 6% कर दिया है। वहीं, कोटक महिंद्रा बैंक ने प्रतिस्पर्धा को बढ़ाते हुए 10 लाख डॉलर से कम के डिपॉजिट पर 6% और बड़ी राशि पर 6.15% ब्याज की पेशकश की है। बैंक ऑफ बड़ौदा ने इस दायरे को और बढ़ाते हुए न केवल अमेरिकी डॉलर, बल्कि ब्रिटिश पाउंड, यूरो, ऑस्ट्रेलियन डॉलर और कैनेडियन डॉलर पर भी उच्च ब्याज दरों की पेशकश की है।

बड़ी तस्वीर: यह क्यों महत्वपूर्ण है?

बैंकों की यह सक्रियता केवल उनके अपने बैलेंस शीट तक सीमित नहीं है; यह रुपये को मजबूत करने और विदेशी मुद्रा प्रवाह को स्थिर करने का एक रणनीतिक प्रयास है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन उपायों से 60 अरब डॉलर से 70 अरब डॉलर तक की विदेशी पूंजी आकर्षित हो सकती है। बैंकों के लिए हेजिंग लागत कम करके, RBI ने उन्हें NRI फंड जुटाने के लिए अधिक आक्रामक होने का मौका दिया है।

जमाकर्ताओं के लिए, यह समय मुद्रा की मजबूती और घरेलू ब्याज दरों के बीच संतुलन बनाने का है। हालांकि इसका मुख्य उद्देश्य विदेशी मुद्रा को आकर्षित करना है, लेकिन इसका सकारात्मक प्रभाव यह होगा कि बैंकिंग क्षेत्र बाजार की अस्थिरता को बेहतर ढंग से संभालने में सक्षम होगा। यह तरलता भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कितनी मददगार साबित होगी, यह देखना बाकी है, लेकिन फिलहाल NRI निवेशकों के लिए यह एक बेहद अनुकूल स्थिति है।

द्वारा अनन्या अय्यर
वैश्विक मामले संवाददाता

अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।