जब सिस्टम हो जाता है फेल: NEET पेपर लीक कांड की भारी कीमत
व्यापक धांधली के बाद छात्रों में तनाव और टेलीग्राम पर प्रतिबंध
लाखों उम्मीदवारों के लिए मेडिकल स्कूल का सपना अब थकान और डिजिटल प्रतिबंधों के एक अंतहीन चक्र में बदल गया है।
भोपाल की 18 वर्षीय रिध्वी सक्सेना ने अपने तीन साल चार दीवारों के बीच बिताए, मेडिकल करियर की एक उम्मीद के लिए अपने परिवार और जवानी के पलों को कुर्बान कर दिया। जब 3 मई को वह NEET की परीक्षा देकर बाहर निकलीं, तो उन्हें लगा कि मंजिल मिल गई है। लेकिन यह राहत बहुत कम समय के लिए थी। पेपर लीक होने के एक बड़े घोटाले के बाद, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने परिणामों को रद्द कर दिया, जिससे 20 लाख से अधिक छात्रों को दोबारा परीक्षा की तैयारी करने के लिए मजबूर होना पड़ा। सक्सेना और उनके साथियों के लिए, यह सिर्फ एक परीक्षा का मामला नहीं है; यह उस सिस्टम का सवाल है जो अपनी ईमानदारी खोने के बोझ तले दब गया है।
डिजिटल कार्रवाई
लीक हुई सामग्री के प्रसार को रोकने के लिए एक हताश कदम उठाते हुए, अधिकारियों ने टेलीग्राम पर अस्थायी रूप से देशव्यापी प्रतिबंध लगा दिया। यह मैसेजिंग ऐप नकल कराने वाले गिरोहों का मुख्य अड्डा बन गया था, जहाँ संवेदनशील दस्तावेजों का खुलेआम सौदा होता था। सरकार ने इसे “भारत की संप्रभुता और अखंडता के हित” का हवाला देते हुए ब्लॉक किया है, जो 22 जून तक प्रभावी है। जहाँ NTA का दावा है कि यह प्रतिबंध भविष्य की परीक्षाओं को सुरक्षित करेगा, वहीं टेलीग्राम के संस्थापक पावेल डुरोव ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि ऐसे उपाय लाखों निर्दोष उपयोगकर्ताओं को दंडित करते हैं, जबकि असली अपराधी पहले ही अन्य प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट हो चुके हैं।
बर्नआउट की संस्कृति
इंजीनियरिंग के लिए JEE की तरह ही, NEET भी देश की सबसे कठिन शैक्षणिक चुनौतियों में से एक है। छात्र अक्सर इन प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए वर्षों समर्पित कर देते हैं और इस प्रक्रिया में अपनी सेहत की बलि दे देते हैं। सक्सेना, जो पहले भी एक बार परीक्षा दे चुकी हैं, दोबारा परीक्षा के नाम से ही “बर्नआउट” महसूस कर रही हैं। जब छात्र आजादी की उम्मीद कर रहे हों, तब उन्हें फिर से गहन अध्ययन के चक्र में धकेलने का मनोवैज्ञानिक असर पूरे देश के छात्रों में देखा जा सकता है। आगामी रविवार को होने वाली परीक्षा को लेकर अनिश्चितता ने उन छात्रों की चिंता और बढ़ा दी है, जिन्हें लगता है कि सिस्टम ने उन्हें पीछे छोड़ दिया है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
इसके व्यापक निहितार्थ डिजिटल युग में प्रतियोगी परीक्षाओं के संचालन में मौजूद बुनियादी खामियों की ओर इशारा करते हैं। जब एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स और गुप्त गिरोहों के कारण राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा की विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाती है, तो यह पारंपरिक संस्थागत निगरानी और आधुनिक तकनीकी खतरों के बीच की खाई को उजागर करता है। किसी पूरे ऐप को बैन करने का निर्णय सरकार की नियंत्रण पाने की हड़बड़ाहट को दर्शाता है, लेकिन यह एक पुरानी समस्या को भी उजागर करता है: जब नकल की तकनीक विकसित हो जाती है, तो परीक्षा का बुनियादी ढांचा अक्सर उसका मुकाबला करने में नाकाम रहता है। जब तक पेपरों को संभालने और सुरक्षित रखने की प्रक्रिया में ढांचागत सुधार नहीं होता, तब तक विफलता का बोझ छात्रों पर ही पड़ता रहेगा।
आगे की राह
अब जबकि सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) पेपर लीक की जांच कर रही है, सारा ध्यान इसके लिए जिम्मेदार लोगों को पकड़ने पर है। हालांकि, जो छात्र दूसरी बार अपनी किताबों में सिर गड़ाए बैठे हैं, उनके लिए यह जांच कोई खास राहत नहीं लाती। वे एक प्रणालीगत संकट के बीच फंसे हुए हैं और उस समाधान का इंतजार कर रहे हैं जो योग्यता आधारित व्यवस्था (meritocracy) में उनका भरोसा बहाल कर सके, जो फिलहाल पूरी तरह से टूटा हुआ महसूस हो रहा है।
कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।