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NCLT की कार्यवाही से विक्रम सोलर की मुश्किलें बढ़ीं, निवेशकों में हलचल

दिवाला याचिका स्वीकार किए जाने के NCLT के आदेश के बाद विक्रम सोलर के शेयरों में 2% की गिरावट

द्वारा अर्जुन मेहताप्रकाशित 23 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
विक्रम सोलर की मुश्किलें बढ़ीं, NCLT में दिवाला याचिका से निवेशकों में हलचल
विक्रम सोलर की मुश्किलें बढ़ीं, NCLT में दिवाला याचिका से निवेशकों में हलचल

सौर ऊर्जा क्षेत्र की इस कंपनी ने 9.44 करोड़ रुपये के विवादित दावे पर आए दिवाला आदेश को चुनौती देने का फैसला किया है, जबकि कंपनी के हालिया वित्तीय नतीजे मजबूत परिचालन स्थिति की ओर इशारा करते हैं।

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की कोलकाता बेंच द्वारा विक्रम सोलर के खिलाफ दिवाला याचिका स्वीकार किए जाने के बाद सौर ऊर्जा क्षेत्र की नजरें इस मामले पर टिकी हैं। 12 जून को पारित और 18 जून को सार्वजनिक हुए इस आदेश के बाद बाजार में तत्काल प्रतिक्रिया देखने को मिली, जिससे 22 जून को विक्रम सोलर का शेयर भाव 2% गिरकर 196.3 रुपये पर आ गया।

यह याचिका 'इस्तवा स्टील्स' (Isitva Steels) द्वारा इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) की धारा 9 के तहत दायर की गई थी, जिसमें 9.44 करोड़ रुपये के बकाया का दावा किया गया है। इस राशि में लगभग 4.21 करोड़ रुपये का ब्याज भी शामिल है। हालांकि, कंपनी ने पलटवार करते हुए कहा है कि यह दावा पूरी तरह से अमान्य है, क्योंकि दिसंबर 2019 में दोनों पक्षों के बीच आंध्र प्रदेश में एक सौर परियोजना के सिविल कार्यों को लेकर पूर्ण और अंतिम समझौता हो चुका था।

कानूनी गतिरोध और कंपनी की प्रतिक्रिया

NCLT के आदेश के बाद, तृप्ति अग्रवाल को इस प्रक्रिया की देखरेख के लिए अंतरिम समाधान पेशेवर (Interim Resolution Professional) नियुक्त किया गया है। विक्रम सोलर ने स्पष्ट किया है कि वह नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के समक्ष अपील दायर करने के लिए कानूनी सलाहकारों से परामर्श कर रही है।

स्टॉक एक्सचेंजों को दी गई जानकारी में कंपनी ने कहा कि उसकी वित्तीय स्थिति मजबूत बनी हुई है। कंपनी ने वित्त वर्ष 2026 के लिए 4,802 करोड़ रुपये का राजस्व और 470 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ दर्ज किया है। इसके अलावा, प्रबंधन ने जोर देकर कहा कि 31 मार्च, 2026 तक उन पर कोई दीर्घकालिक कर्ज नहीं है और मौजूदा ऋणदाताओं ने पुष्टि की है कि उनके खाते मानक (standard) और चालू स्थिति में हैं।

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है: व्यापक परिप्रेक्ष्य

यह मामला पुराने अनुबंध विवादों में निहित जटिलताओं की याद दिलाता है। मजबूत बैलेंस शीट और बेहतर वर्किंग कैपिटल साइकिल (पिछले वित्त वर्ष के 82 दिनों से घटकर 44 दिन) वाली कंपनियों के लिए भी दिवाला याचिका का स्वीकार होना तत्काल बाधाएं पैदा करता है।

निवेशकों के लिए मुख्य चिंता केवल शेयर की कीमतों में अस्थिरता नहीं है, बल्कि कानूनी कार्यवाही के कारण होने वाला परिचालन व्यवधान है। ऋणदाताओं के साथ कंपनी का 'मानक और नियमित' बने रहना एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच है, फिर भी बाजार NCLAT की कार्यवाही से जुड़ी अनिश्चितता को स्पष्ट रूप से देख रहा है। जैसे-जैसे अक्षय ऊर्जा क्षेत्र का विस्तार हो रहा है, सब-कॉन्ट्रैक्टेड सिविल कार्यों को लेकर ऐसे विवाद यह दर्शाते हैं कि पुरानी देनदारियां सबसे अधिक लाभदायक कंपनियों के लिए भी जोखिम पैदा कर सकती हैं।

द्वारा अर्जुन मेहता
राष्ट्रीय मामले संवाददाता

अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।