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तिजोरी की जंग: TMC के बैंक अकाउंट फ्रीज संकट की अंदरूनी कहानी

अकाउंट फ्रीज की मांग के बीच TMC के पैसों और संपत्ति का क्या होगा?

द्वारा कबीर शर्माप्रकाशित 19 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
तिजोरी की जंग: TMC के बैंक अकाउंट फ्रीज संकट की अंदरूनी कहानी
तिजोरी की जंग: TMC के बैंक अकाउंट फ्रीज संकट की अंदरूनी कहानी

पार्टी में मची आंतरिक बगावत के बीच, 676 करोड़ रुपये की यह लड़ाई अब सत्ता के गलियारों से निकलकर कोलकाता के एक निजी बैंक के मैनेजर की मेज तक पहुंच गई है।

ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) की आंतरिक कार्यप्रणाली एक बड़े झटके के साथ थम गई है। यह किसी सार्वजनिक रैली या विधायी हार के कारण नहीं, बल्कि कोलकाता के एक बैंक मैनेजर को दिए गए एक औपचारिक अनुरोध के कारण हुआ है। पार्टी के वित्तीय कामकाज में अहम भूमिका निभाने वाले अरूप बिस्वास ने एक बड़ा धमाका किया है: उन्होंने मांग की है कि पार्टी के बैंक खातों को तुरंत फ्रीज कर दिया जाए। संगठन की कमान किसके हाथ में है, इसे लेकर 'गंभीर विवाद' का हवाला देते हुए, बिस्वास ने बैंक को किसी भी तरह के लेनदेन की अनुमति न देने की चेतावनी दी है। उनका दावा है कि पार्टी कार्यालय में रखे हस्ताक्षरित चेक अब किसी टाइम बम से कम नहीं हैं, जिनका दुरुपयोग हो सकता है।

दांव पर लगी रकम बेहद बड़ी है। चुनाव आयोग में पार्टी की हालिया फाइलिंग के अनुसार, TMC के पास नकद, बैंक बैलेंस और चेक के रूप में 676.11 करोड़ रुपये से अधिक का फंड मौजूद है। ऐसे समय में जब पार्टी अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के इस्तीफे और नेतृत्व के बीच खुली बगावत से जूझ रही है, पैसों का यह पहाड़ सिर्फ एक संपत्ति नहीं, बल्कि सत्ता का सबसे बड़ा जरिया है।

बंटी हुई पार्टी का कागजी विवाद

12 जून को लिखे अपने पत्र में, बिस्वास ने खुद को पार्टी का कोषाध्यक्ष बताया है, जिस पद को TMC नेतृत्व अब पूरी तरह से नकार रहा है। पार्टी का कहना है कि बिस्वास को उनके इस कदम से कुछ दिन पहले ही, यानी 5 जून को आधिकारिक तौर पर पद से हटा दिया गया था। यह एक प्रशासनिक संकट पैदा करता है: यदि बैंक बिस्वास को अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता मानता है, तो पार्टी का कामकाज ठप हो जाएगा। यदि वे मौजूदा नेतृत्व का पक्ष लेते हैं, तो उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के औपचारिक अनुरोध को नजरअंदाज करने का जोखिम उठाना पड़ेगा, जिसके पास हाल तक पार्टी की तिजोरी की चाबियां थीं।

बिस्वास का तर्क मौजूदा अस्थिरता पर आधारित है। उन्होंने इस बात की ओर इशारा किया है कि कई वरिष्ठ नेताओं ने या तो पाला बदल लिया है या वे खुलेआम पार्टी आलाकमान को चुनौती दे रहे हैं। उन्होंने लिखा, "प्रतिद्वंद्वी गुट खुद को वैध प्रतिनिधि बता रहे हैं," जिससे संकेत मिलता है कि यथास्थिति बनाए बिना पार्टी का खजाना किसी के भी हाथ लग सकता है।

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है

यह सिर्फ फंड को लेकर झगड़ा नहीं है; यह एक ऐसी राजनीतिक पार्टी का संकेत है जिसने अपनी आंतरिक दिशा खो दी है। जब कोई पार्टी अपने ही बैंक खातों को लेकर लड़ने लगे, तो यह मतदाताओं और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को संदेश देता है कि संगठन अब एक एकजुट इकाई के रूप में काम नहीं कर रहा है। ऐतिहासिक रूप से, इस तरह के वित्तीय विवाद उस पार्टी का अंतिम अध्याय होते हैं जिसने खुद को संचालित करना बंद कर दिया हो और अपने ही सदस्यों से संपत्ति बचाने में जुट गई हो।

TMC के लिए असली खतरा सिर्फ फंड का फ्रीज होना नहीं है, बल्कि इससे पैदा होने वाला कानूनी और प्रशासनिक शून्य है। यदि अदालतें या चुनाव आयोग इस मामले में शामिल होते हैं, तो पार्टी अपने दैनिक कामकाज, कानूनी लड़ाई या राजनीतिक गतिविधियों के खर्च उठाने में असमर्थ हो सकती है। जैसे-जैसे सत्ता का संघर्ष गहराता जा रहा है, सवाल यह बना हुआ है कि TMC पर वास्तव में किसका नियंत्रण है, और जब यह धूल बैठेगी, तब तक क्या तिजोरी में कुछ बचेगा भी?

द्वारा कबीर शर्मा
फ़ीचर्स लेखक

कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।