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अनकहा समझौता: शबाना रज़ा क्यों कभी मनोज बाजपेयी के फिल्म सेट पर नहीं जातीं?

मनोज बाजपेयी ने पत्नी शबाना के साथ अपनी प्रेम कहानी और उनके सेट पर न आने के पीछे की वजह का खुलासा किया

द्वारा अर्जुन मेहताप्रकाशित 27 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
अनकहा समझौता: शबाना रज़ा क्यों कभी मनोज बाजपेयी के फिल्म सेट पर नहीं जातीं?
अनकहा समझौता: शबाना रज़ा क्यों कभी मनोज बाजपेयी के फिल्म सेट पर नहीं जातीं?

अभिनेता मनोज बाजपेयी ने अपनी पत्नी शबाना रज़ा के साथ अपने लंबे समय के रिश्ते पर बात करते हुए उन खामोश सीमाओं का जिक्र किया है, जो उनकी दशकों पुरानी शादी की नींव हैं।

भारतीय सिनेमा की चकाचौंध भरी दुनिया में, जहां अक्सर मशहूर हस्तियों की शादियां सुर्खियों में रहती हैं, मनोज बाजपेयी और शबाना रज़ा ने एक बिल्कुल अलग मिसाल कायम की है। उनकी कहानी जुलाई 1998 में शुरू हुई, जो दोनों के करियर के लिए एक अहम मोड़ था: बाजपेयी ने 'सत्य' फिल्म में 'भीकू म्हात्रे' के किरदार से दर्शकों को हैरान कर दिया था, वहीं रज़ा—जिन्हें तब नेहा के नाम से जाना जाता था—विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म 'करीब' से चर्चा में थीं। एक पार्टी में पहली नजर में हुआ यह प्यार 2006 में शादी के बंधन में बंध गया।

सेट की मर्यादा

एक ही पेशे से जुड़े होने के बावजूद, उनकी निजी जिंदगी में एक सख्त सीमा तय है: शबाना कभी भी उस फिल्म सेट पर नहीं गईं जहां बाजपेयी काम कर रहे हों। अभिनेता के लिए, यह दूरी का संकेत नहीं, बल्कि भावनात्मक समझ का एक गहरा रूप है। बाजपेयी बताते हैं कि उनकी पत्नी ने शुरुआत में ही उनके काम की गंभीरता को समझ लिया था। उन्होंने महसूस किया कि सेट पर मौजूद 'मनोज'—जो किसी किरदार की मनोवैज्ञानिक गहराइयों में डूबा होता है—घर लौटने वाले व्यक्ति से बिल्कुल अलग होता है। सेट से दूर रहकर, वह उस घर्षण से बचती हैं जो तब पैदा हो सकता है जब कोई अभिनेता अपने काम में पूरी तरह व्यस्त हो और परिवार को समय न दे पाए।

स्क्रीन से परे

समझदारी का यह स्तर उनके रिश्ते की बुनियाद रहा है, जिसने लगभग तीन दशकों के उतार-चढ़ाव को झेला है। हालांकि रज़ा ने 2009 में अपने अभिनय करियर से दूरी बना ली थी, लेकिन बाजपेयी के पेशेवर सफर पर उनका प्रभाव आज भी बना हुआ है। बाजपेयी ने पहले भी साझा किया है कि वह एक आलोचक की तरह उन्हें सलाह देती हैं, और कभी-कभी उन्हें काम की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए बड़े लेकिन कमजोर प्रोजेक्ट्स को छोड़ने की सलाह भी देती हैं। उनका रिश्ता, जो एक अंतर-धार्मिक विवाह (इंटर-फेथ मैरिज) की मिसाल है—जहां बाजपेयी एक गौरवान्वित हिंदू हैं और रज़ा एक गौरवान्वित मुस्लिम—अभिनेता के अनुसार आपसी सम्मान का प्रतीक है, न कि किसी समझौते का।

यह क्यों मायने रखता है

इस जोड़े की कहानी लंबे समय तक चलने वाले कलात्मक रिश्तों की हकीकत को दर्शाती है। एक ऐसे उद्योग में जहां सार्वजनिक और निजी जीवन के बीच की रेखाएं अक्सर धुंधली हो जाती हैं, 'कार्यस्थल' को पवित्र रखने का उनका फैसला लंबे रिश्ते के लिए एक उदाहरण है। यह इस धारणा को चुनौती देता है कि मशहूर हस्तियों के जीवनसाथी को एक-दूसरे की सार्वजनिक छवि का विस्तार होना चाहिए। इसके बजाय, बाजपेयी-रज़ा का घर 'स्वतंत्रता' के दर्शन पर चलता है; अपने पेशेवर संसार को अलग रखकर, वे यह सुनिश्चित करते हैं कि उनका घर स्टूडियो का विस्तार न बनकर एक सुकून भरी जगह बना रहे।

द्वारा अर्जुन मेहता
राष्ट्रीय मामले संवाददाता

अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।