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रस्साकशी: क्या ममता बनर्जी के 'ओल्ड गार्ड' का सब्र अब जवाब दे रहा है?

अभिषेक या कल्याण: राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई के बीच तृणमूल में बढ़ता आंतरिक कलह

द्वारा रोहन गुप्ताप्रकाशित 13 जून 2026· 3 मिनट पढ़ें
रस्साकशी: क्या ममता बनर्जी के 'ओल्ड गार्ड' का सब्र अब जवाब दे रहा है?
रस्साकशी: क्या ममता बनर्जी के 'ओल्ड गार्ड' का सब्र अब जवाब दे रहा है?

पार्टी के एक दिग्गज कानूनी योद्धा की चेतावनी ने तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व को पार्टी की विरासत और नई पीढ़ी के बीच पनप रहे तनाव का सामना करने के लिए मजबूर कर दिया है।

अदालत का कमरा लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस के लिए मुख्य रणभूमि रहा है, और दशकों तक कल्याण बनर्जी इसके सबसे भरोसेमंद योद्धा रहे हैं। चाहे सिंगुर और नंदीग्राम में जमीन अधिग्रहण से जुड़े हाई-प्रोफाइल मामले हों या हाल ही में I-PAC और राज्य की जांच रिपोर्टों से जुड़ी कानूनी मुश्किलें, श्रीरामपुर के सांसद ने हमेशा ममता बनर्जी के लिए एक ढाल का काम किया है। हालांकि, मौजूदा आंतरिक खींचतान एक गहरे विभाजन की ओर इशारा कर रही है, जिसने एक सामान्य कानूनी मामले को पार्टी के भविष्य के लिए लिटमस टेस्ट बना दिया है।

विवाद की जड़ एक कथित हस्ताक्षर जालसाजी का कानूनी मामला है, जहां इस दिग्गज सांसद ने खुद को अभिषेक बनर्जी द्वारा दरकिनार किए जाने का अनुभव किया। जो व्यक्ति चालीस वर्षों से अधिक समय से पार्टी की कानूनी सुरक्षा का मुख्य स्तंभ रहा हो, उसके लिए किसी बड़े मामले में नजरअंदाज किया जाना महज एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक अपमान है, जो अब एक अल्टीमेटम में बदल गया है। कल्याण ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है: पार्टी अब पुराने और नए खेमे के बीच एक चौराहे पर खड़ी है, जिससे ममता बनर्जी के लिए संतुलन बनाना मुश्किल हो गया है।

वफादारी की कीमत

अपने सार्वजनिक बयानों में कल्याण बनर्जी ने कोई लाग-लपेट नहीं रखी। उन्होंने पार्टी की आंतरिक राजनीति की आग में झुलसने की बात कही और उल्लेख किया कि उन्हें भ्रष्टाचार के सार्वजनिक ताने सुनने पड़ रहे हैं, जिसका कारण वे अभिषेक के नेतृत्व में बदलती कार्यशैली को मानते हैं। हालांकि वे मुख्यमंत्री और उनके भतीजे के बीच के रक्त संबंधों का सम्मान करते हैं, लेकिन वे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को टीएमसी के उदय में अपने चालीस वर्षों के पसीने और कानूनी संघर्ष की याद दिलाना नहीं भूलते।

यह केवल एक कानूनी फाइलिंग का मामला नहीं है; यह संगठन के भीतर सत्ता के बदलते केंद्र के बारे में है। अभिषेक के मामले से हटने का दिग्गज वकील का निर्णय एक स्पष्ट और सार्वजनिक संकेत है कि 'ओल्ड गार्ड' के प्रति पारंपरिक सम्मान कम हो रहा है। जब वे कहते हैं कि "अहंकार के लिए कोई जगह नहीं है" और सम्मान आपसी होना चाहिए, तो वे पार्टी के उन कई नेताओं की भावनाओं को व्यक्त कर रहे हैं जो मौजूदा बदलाव के दौर में खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे हैं।

यह महत्वपूर्ण क्यों है?

यह गतिरोध एक क्लासिक संस्थागत चुनौती को दर्शाता है: कोई पार्टी अपने संस्थापक सदस्यों की विश्वसनीयता और उभरते युवा नेतृत्व की महत्वाकांक्षाओं के बीच संतुलन कैसे बनाए रखे? ममता बनर्जी के लिए यह चुनौती दोहरी है। पहली, केंद्रीय एजेंसियों की लगातार जांच के दौरान उन्हें कानूनी स्थिरता बनाए रखनी है। दूसरी, उन्हें नई पीढ़ी की आकांक्षाओं को भी संभालना है, बिना उस आधारभूत ढांचे को तोड़े जिसने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया है।

इस "अभिषेक या कल्याण" द्वंद्व के निहितार्थ गहरे हैं। यदि पार्टी अपने पुराने रक्षकों की कीमत पर नई पीढ़ी को प्राथमिकता देना जारी रखती है, तो उसे उस संस्थागत स्मृति और कानूनी मजबूती को खोने का जोखिम उठाना पड़ सकता है जिसने उसे पिछले संकटों से उबारा था। इसके विपरीत, अगली पीढ़ी को सशक्त बनाने में विफल रहने से पार्टी का विकास और आधुनिकीकरण रुक सकता है। मौजूदा गतिरोध यह बताता है कि टीएमसी का आंतरिक बदलाव अब कोई शांत मामला नहीं रहा—यह अस्तित्व, सम्मान और प्रासंगिकता के लिए एक सार्वजनिक मोलभाव बन गया है।

द्वारा रोहन गुप्ता
बिज़नेस संवाददाता

रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।