Politicalpedia
मनोरंजन

स्टारडम की असली कीमत: रणवीर-फरहान के 'डॉन 3' विवाद पर अभिषेक बनर्जी ने तोड़ी चुप्पी

ABP एक्सक्लूसिव | 'पिस्ता तो हमेशा गरीब ही है': रणवीर सिंह-फरहान अख्तर के 'डॉन 3' विवाद पर बोले अभिषेक बनर्जी

द्वारा कबीर शर्माप्रकाशित 9 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
स्टारडम की असली कीमत: रणवीर-फरहान के 'डॉन 3' विवाद पर अभिषेक बनर्जी ने तोड़ी चुप्पी
स्टारडम की असली कीमत: रणवीर-फरहान के 'डॉन 3' विवाद पर अभिषेक बनर्जी ने तोड़ी चुप्पी

अभिनेता ने बताया कि कैसे हाई-प्रोफाइल विवादों का खामियाजा सबसे कमजोर वर्ग के कामगारों को भुगतना पड़ता है।

बॉलीवुड की चकाचौंध अक्सर एक ऐसी कड़वी सच्चाई को छिपा लेती है, जहां एक छोटा सा रचनात्मक मतभेद पूरे फिल्म उद्योग के दिहाड़ी मजदूरों की रोजी-रोटी पर असर डाल सकता है। जब रणवीर सिंह ने बहुप्रतीक्षित फिल्म डॉन 3 के प्री-प्रोडक्शन चरण के दौरान फिल्म से किनारा किया, तो इसका असर सिर्फ कास्ट बदलने तक सीमित नहीं रहा; कथित तौर पर इससे करीब 45 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ। अभिनेता और फिल्म निर्माता फरहान अख्तर के बीच का यह तनाव सार्वजनिक हो गया, जिसके चलते फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉइज (FWICE) ने रणवीर सिंह के खिलाफ कुछ समय के लिए असहयोग का निर्देश जारी कर दिया था।

हालांकि कानूनी विवाद अब सुलझ चुका है—रणवीर सिंह द्वारा कानूनी नोटिस भेजे जाने के बाद यूनियन ने अपना निर्देश वापस ले लिया था—लेकिन इस घटना ने एक ऐसी बहस छेड़ दी है जो कॉन्ट्रैक्ट और बॉक्स-ऑफिस के आंकड़ों से कहीं आगे है। एक ABP एक्सक्लूसिव बातचीत में, अभिनेता अभिषेक बनर्जी ने डॉन 3 विवाद पर अपनी राय रखी। उन्होंने सेलिब्रिटी कल्चर की परतें हटाते हुए उन लोगों पर ध्यान केंद्रित किया, जो प्रोडक्शन चेन के सबसे निचले पायदान पर खड़े होते हैं।

निचले स्तर से नजरिया

बनर्जी के लिए, यह विवाद केवल दो बड़े सितारों के बीच की लड़ाई नहीं है। उनकी बात सीधी और जमीनी है: "पिस्ता तो हमेशा गरीब ही है"। उनका तर्क है कि जब बड़े प्रोजेक्ट्स रुकते हैं, तो इसका तत्काल असर सितारों या निर्माताओं पर नहीं, बल्कि उन लाइटमैन, स्पॉट बॉय और जूनियर तकनीशियनों पर पड़ता है, जो अपने घर का खर्च चलाने के लिए लगातार काम पर निर्भर रहते हैं।

महामारी के दौर की अनिश्चितता का जिक्र करते हुए बनर्जी ने कहा कि जब शूटिंग रुकती है या प्रोजेक्ट्स अनिश्चित काल के लिए टल जाते हैं, तो सिनेमा जगत का निम्न और मध्यम वर्ग का कर्मचारी सबसे पहले प्रभावित होता है। जब रणवीर सिंह और फरहान अख्तर जैसे सितारे सार्वजनिक विवाद में उलझते हैं, तो इसका असर उन सैकड़ों लोगों की आजीविका पर पड़ता है, जिनका पूरा करियर फिल्म इंडस्ट्री की निरंतरता पर टिका होता है।

यह क्यों मायने रखता है

यह घटना भारतीय सिनेमा में एक बार-बार दोहराए जाने वाले पैटर्न को उजागर करती है: बड़े कॉर्पोरेट जवाबदेही और फिल्म उद्योग के गिग-आधारित वर्कफोर्स की अनिश्चित वास्तविकता के बीच का अंतर। एक ऐसी व्यवस्था में जहां एक अभिनेता के बाहर निकलने से 45 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है, वहां प्रशासनिक मशीनरी अक्सर असहयोग जैसे कठोर कदम उठाती है। हालांकि ये कदम निर्माताओं के हितों की रक्षा के लिए होते हैं, लेकिन इनके कारण अक्सर काम पूरी तरह रुक जाता है और क्रू सदस्य अधर में लटक जाते हैं।

अभिषेक बनर्जी की यह टिप्पणी एक जरूरी याद दिलाती है कि इंडस्ट्री का "बिजनेस" सिर्फ बोर्डरूम और कानूनी नोटिस तक सीमित नहीं है; यह एक श्रम-प्रधान मशीन है। भविष्य के लिए संदेश साफ है: अगर इंडस्ट्री को अपनी साख बचाने और सबसे कमजोर वर्ग को नुकसान से बचाना है, तो आंतरिक विवादों को सुलझाने की प्रक्रिया को तेज और कम विघटनकारी बनाना होगा। जब बड़े दिग्गज आपस में लड़ते हैं, तो यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि उनके नीचे की जमीन उन लोगों के लिए न धंसे, जो इसका खामियाजा उठाने में सबसे कम सक्षम हैं।

द्वारा कबीर शर्मा
फ़ीचर्स लेखक

कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।