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चेकर्ड फ्लैग की तलाश: क्या फॉर्मूला 1 की भारत में वापसी होने वाली है?

फॉर्मूला 1: भारत में फॉर्मूला 1 की वापसी पर मांडविया का एलान; मोटरस्पोर्ट्स नीति के लिए टास्क फोर्स का होगा गठन

द्वारा कबीर शर्माप्रकाशित 21 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
चेकर्ड फ्लैग की तलाश: क्या फॉर्मूला 1 की भारत में वापसी होने वाली है?
चेकर्ड फ्लैग की तलाश: क्या फॉर्मूला 1 की भारत में वापसी होने वाली है?

जैसे ही सरकार बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट में फॉर्मूला 1 की वापसी के लिए नए सिरे से प्रयास कर रही है, एक नई टास्क फोर्स के सामने प्रशासनिक महत्वाकांक्षाओं और वैश्विक रेसिंग की वास्तविकताओं के बीच तालमेल बिठाने की बड़ी चुनौती है।

बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट (BIC) पर हाई-ऑक्टेन इंजनों की गड़गड़ाहट 2013 के बाद शांत हो गई थी, जिससे भारतीय मोटरस्पोर्ट प्रेमियों के बीच एक खालीपन आ गया था। अब, केंद्रीय युवा मामले और खेल मंत्रालय उस कहानी को फिर से लिखने की कोशिश कर रहा है। केंद्रीय खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने चार से पांच सदस्यीय टास्क फोर्स के गठन की घोषणा की है, जिसे एक व्यापक रोडमैप तैयार करने का काम सौंपा गया है। यह रोडमैप 2027 या 2028 तक प्रतिष्ठित फॉर्मूला वन रेस को भारतीय सरजमीं पर वापस ला सकता है।

आगे की राह

यह केवल ट्रैक को साफ करने के बारे में नहीं है; यह प्रणालीगत सुधार के बारे में है। समिति, जिसमें मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार, भारतीय मोटरस्पोर्ट महासंघ और सर्किट प्रबंधन के प्रतिनिधि शामिल हैं, को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए तीन महीने का समय दिया गया है। उनका कार्यक्षेत्र व्यापक है: उन्हें मौजूदा स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर का मूल्यांकन करना है, परिचालन संबंधी बाधाओं की पहचान करनी है और ग्रैंड प्रिक्स की मेजबानी के आर्थिक और पर्यटन प्रभाव का गहरा विश्लेषण करना है।

सरकार इसे व्यापक 'प्ले इन इंडिया' पहल में एकीकृत करने की इच्छुक है। केवल एक कार्यक्रम की मेजबानी से आगे बढ़कर, उद्देश्य एक स्थायी पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देना है। तीन निजी कंपनियों ने पहले ही ग्रेटर नोएडा ट्रैक के परिचालन प्रबंधन में रुचि दिखाई है, जिससे यह उम्मीद जगी है कि पिछले दशक में इस स्थल को प्रभावित करने वाली वित्तीय स्थिरता की समस्या से पार पाया जा सकता है।

यह क्यों मायने रखता है: एक यथार्थवादी नजरिया

जमीनी स्तर पर उत्साह है, लेकिन उद्योग जगत सतर्क है। जहां भारत सरकार 2027 में वापसी का लक्ष्य रख रही है, वहीं फॉर्मूला 1 प्रबंधन ने अधिक नपा-तुला रुख अपनाया है। एक आधुनिक F1 इवेंट की मेजबानी करना एक बहुत बड़ा काम है जिसके लिए भारी पूंजी, निरंतर सरकारी समर्थन और सबसे महत्वपूर्ण रूप से, एक ऐसी कर संरचना की आवश्यकता है जो प्रीमियम खेल आयोजन को केवल 'लक्जरी मनोरंजन' के रूप में न देखे—यही वह मुद्दा था जिसने 2011 और 2013 के बीच इसके पहले आयोजन को प्रभावित किया था।

इस कहानी की कवरेज एक क्लासिक खींचतान को उजागर करती है: राज्य-स्तरीय प्रशासनिक उत्साह बनाम वैश्विक मोटरस्पोर्ट निकायों की सख्त और उच्च बाधा वाली आवश्यकताएं। इस बार परिणाम भारत के पक्ष में हों, इसके लिए टास्क फोर्स को केवल योजना बनाने से ज्यादा कुछ करना होगा; उन्हें एक ऐसा नीतिगत ढांचा प्रदान करना होगा जो दीर्घकालिक व्यवहार्यता की गारंटी दे। भारत में हाल ही में हुए मोटोजीपी इवेंट ने साबित कर दिया कि दर्शकों में रुचि है, लेकिन F1 कहीं अधिक जटिल, महंगा और लॉजिस्टिक्स के मामले में चुनौतीपूर्ण है।

बड़ी तस्वीर

यदि सरकार एक समर्पित मोटरस्पोर्ट नीति को औपचारिक रूप देने में सफल हो जाती है, तो यह स्थानीय प्रतिभा विकास के लिए एक उत्प्रेरक के रूप में काम कर सकती है, जो संभावित रूप से अगली पीढ़ी के रेसर्स को तैयार कर सकती है जो वर्तमान में प्रशिक्षण के लिए यूरोप की ओर देखते हैं। हालांकि, यह रास्ता चुनौतियों से भरा है। मेजबान देश का खिताब आसानी से नहीं मिलता। जब तक आगामी रोडमैप 'मनोरंजन बनाम खेल' कर वर्गीकरण के मुद्दे को हल नहीं करता और एक विश्वसनीय सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल सुरक्षित नहीं करता, तब तक BIC पर रेस शुरू होने का सपना सिर्फ एक सपना ही बना रहेगा।

द्वारा कबीर शर्मा
फ़ीचर्स लेखक

कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।